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वंशवादी भ्रष्टाचार का विषबेल-वीरेंद्र देवांगना

वंशवादी भ्रष्टाचार का विषबेल::
सतर्कता और भ्रष्टाचार पर सीबीआइ की ओर से आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय कांफ्रेंस का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा है कि भ्रष्टाचार के किसी एक मामले में कार्रवाई न करने से भविष्य के बड़े घोटालों की नींव तैयार होती है।
वंशवादी भ्रष्टाचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित होता रहता है। कई मामलों में इसकी जड़ें इतनी गहरी हो जाती हैं कि देश के सामने कठिन हालात बन जाते हैं। कुछ राज्यों में भ्रष्टाचार राजनीतिक संस्कृति बन गया है। खानदानों में पनपनेवाला भ्रष्टाचार दीमक की तरह देश को खोखला कर रहा है।
उन्होंने कहा कि ड्रग्स, मनी लांडिंªग, आतंकवाद, आतंकी फंडिंग भी ऐसे अपराध हैं, जो आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
यह एक कटुसत्य है कि देशभर में वंशवादी भ्रष्टाचार का रूप जहां व्यापक है, वहीं भयावह भी है। भयावह इसलिए कि खानदानी भ्रष्टाचार जनता, शासन और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों के नाक के नीचे होता रहता है और गड़बड़ घोटाला जान समझकर भी लोगांे को खून के घूंट पीकर रहना पड़ जाता है।
व्ंाशवादी भ्रष्टाचार के पनपने और परवान चढ़ने का एक बड़ा कारण यह भी कि जांच एजेंसियां बरसों तक जांच ही करती रहती हैं और न्यायपालिका तारीख-पर-तारीख बढ़ाती रहती है। कई मामले में तो यह इतना लंबा खींच जाता है कि न्याय के प्रति जनता का विश्वास ही डिगने लगता है।
इसका बेहतरीन उदाहरण है- बिहार का करोड़ो रुपए का बहुचर्चित चारा घोटाला, जिसका फैसला घोटाला होने के 25-30 साल बाद आया। चारा घोटाला की जांच-पड़ताल बरसों-बरस तक चली। हजारों दांव-पेंच चली। जाल-साजियां हुईं।
चार्जसीट दाखिल होने में भी बरसों लग गए। जब न्यायालयों में सुनवाई और वकीलों के दांव चले, तो उसमें भी इतना अरसा बीत गया कि न्याय कि असल मंशा ही धूल-धूसरित हो गई। इस बीच घोटालेबाज नेता, नौकरशाह पदों पर बने रहे और सुबूतों व गवाहों से छेड़खानी व धमकी-चमकी करके न्याय को प्रभावित करते रहे।
इसी का दुष्परिणाम है कि चारा घोटाला में सजायाफ्ता लालू यादव की तस्वीर बिहार विधानसभा चुनाव में राजद के भारी-भरकम पोस्टरों से होशियारी से गायब कर दी गई।
यह देखना तो सरकार और उससे जुड़ी भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों का काम है कि वह भ्रष्टाचार के वंशवादी रूप को देश के सम्मुख बेनकाब करे। अच्छा होता कि प्रधानमंत्री महोदय इसपर भी अपना रूख साफ करते कि एनडीए के शासनकाल के छह साल बाद भी कालाधन वापसी, 2जी स्पेक्ट्रम, कोयला घोटाला, कामनवेल्थ घोटाला और अन्य अनेक घोटालों की परतें अभी तक क्यों नहीं खोली जा सकी हंै।
ऐसा करने से उन्हें किसने रोका है? जबकि देश की जानता चाहती है कि देशधन के लुटेरे बेनकाब हों, उनका पर्दाफाश हो।
न्यायपालिका की सुस्ती को दूर करने के लिए जजों के रिक्तपदों की पूर्ति क्यों नहीं की जाती है? जबकि सबल न्यायपालिका के बिना भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ फैसला आने और उनपर अंकुश लगाने का काम लगभग असंभव है।
खानदानी भ्रष्टाचार सब राज्यों और सब पार्टियांे में है, फिर चाहे कांग्रेस, भाजपा हो या फिर सपा, बसपा, राजद, राकांपा, तृणमूल कांग्रेस, अगप, तेलुगु देशम, अकालीदल, डीएमके, एआइएडीएमके, नेशनल कांफ्रेंस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, जकांछ इत्यादि।
कई पार्टियांे के नेताओं और गणमान्य नागरिकों के नाम तो बहुचर्चित पनामा पेपर्स में भी उछले, लेकिन आश्चर्यजनक ढंग से पनामा पेपर्स के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, जबकि पनामा पेपर्स के मामले में अदालती फैसले से नापाक पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को कुर्सी त्यागकर जेल का रुख करना पड़ गया है।
हर पार्टी में कोई-न-कोई ऐसा नेता जरूर रहता है, जो बरसोंबरस शासन व सत्ता में रहता है, जो स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त रहकर अपने परिजनों को भ्रष्ट आचार-विचार की सीख देता रहता है।
यह मामला देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार से शुरू होकर विषबेल की तरह समस्त पार्टियों के छोटे-बड़े नेताओं के खानदान की धमनियों में बहने लगा है। यही कारण है कि जब चुनावी टिकट का बंटवारा होता है, तब बंदरबांट होता है, ताकि अपने खानदानी लोगों को अधिक-से-अधिक सत्ता का स्वाद चखाया जा सके। दूसरे योग्य नेताओं को छोड़कर भाई भतीजावाद चलाया जाता है।
लिहाजा, मामला ऐसा हो गया है कि शासन-सत्ता में रहकर लूटखसोट और धनसंचय नहीं किए, तो फिर क्या किए?
भ्रष्टाचार की समस्या विश्वव्यापी है, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट से प्रमाणित होती है। फर्क इतना है कि कहीं यह ज्यादा है, तो कहीं कम। दरअसल सभ्यता के विकास के साथ-साथ भ्रष्टाचार पुष्पित-पल्लवित होता रहा है। महान विचारक और साधक चाणक्य ने अपनी अमर कृति ‘अर्थशास्त्र’ में 40 किस्म के भ्रष्टाचरण का जिक्र किया है।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कभी कहा था, ‘‘हमारी योजनाओं का केवल 15 फीसदी धन ही आमजन तक पहुंच पाता है। बाकी धन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।’’
वंशवादी नेता को छोड़ दें, तो आम इंसान की फितरत है कि वह धन कमाना चाहता है। सुख-सुविधा जुटाना चाहता है। बंगला, मोटरगाड़ी खरीदना चाहता है। किंतु यही काम ईमानदारी से न करके चोरी-छिपे, अनैतिक तरीके से, कानून के विरूद्ध, तरफदारी से करता है और स्वार्थपूर्ति के लिए अधिकारों का दुरूपयोग करता है, तो भ्रष्टाचार कहलाता है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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