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विश्व हिंदी सम्मेलन-वीरेंद्र देवांगना

विश्व हिंदी सम्मेलनः
साल 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने विश्व में हिंदी के बढ़ते प्रभाव के दृष्टिगत नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन करवाया था, जो 10 जनवरी को हुआ। इस निर्णय में चूंकि निश्चित अंतराल सुनिश्चित नहीं था; इसलिए आगामी सम्मेलनों का क्रम गड़बड़ाता चला गया।
इसी व्यतिक्रम को समाप्त कर डा. मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को ‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाने का निश्चय किया। उद्देश्य रखा,‘‘विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता और अनुराग पैदा करना, हिंदी के लिए वातावरण तैयार करना तथा हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रस्तुत करना।’’
इसके उपरांत प्रति तीन वर्ष के अंतराल पर विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित करना आरंभ किया गया और प्रतिवर्ष 10 जनवरी को ‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाना निश्चित हुआ।
प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर सहित अब तक 11 सम्मेलन हो चुके हैं, जो इस प्रकार हैं।
पहला 1975 में नागपुर में, दूसरा 1976 में पोर्ट लुई (मारिशस) में, तीसरा 1983 में नई दिल्ली में, चैथा 1993 में पोर्ट लुई (मारिशस) में, पांचवां 1996 में ट्रिनिडाड-टोबैगो में, छठा 1999 में लंदन में, सातवां 2003 में पारामरिबो-सूरीनाम में, आठवां 2007 में न्यूयार्क में, नौवां 2012 में जोहानिसबर्ग-दक्षिण अफ्रीका में, दसवां 2015 में भोपाल में, ग्यारहवां 2018 में पोर्ट लुई (मारिशस) में आयोजित किया जा चुका है। आगे बारहवां विश्व हिंदी सम्मेलन 2021 में फिजी में होना तय किया गया है।
लेकिन, अफसोस यह कि 11-11 विश्व हिंदी-सम्मेलन होने के बावजूद हिंदी को वैश्विक परिदृश्य में न उतना महत्व दिलवाया गया, न संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यसंचालन की भाषा बनाया गया। यही नहीं, पिछले सम्मेलनों में पारित प्रस्तावों पर क्या कार्रवाई की गई; अगले सम्मेलनों में उसपर सम्यक चर्चा और कार्रवाई तक नहीं किया गया? उनके प्रगति-विवरणों को चर्चा-पटल पर रखा तक नहीं गया?
उल्लेखनीय है कि दुनिया के 194 देशों में-से 137 देशों में हिंदीप्रेमी लोग मौजूद हैं। इसमें भारत के अलावा नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, इंडोनेशिया, थाईलैंड, चीन, जापान, मलेशिया, सिंगापुर, यमन संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, मारिशस, सऊदी अरब, युगांडा, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद एंड टोबैगो, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, न्यूजीलैंड, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, फिजी आदि मुल्कों में हिंदीभाषा के जानकारों की बड़ी संख्या बसती है।
जैसे भारत में अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना, समस्त देशी व विदेशी विश्वविद्यालययों में ‘हिंदी पीठ’ की स्थापना, विदेश में निवासरत भारतीयों के लिए हिंदी को पुनर्प्रतिष्ठित करना, हिंदीप्र्रेमियों के द्वारा वैयक्तिक व सार्वजनिक जीवन में हिंदी को अपनाना; हस्ताक्षरों, आमंत्रणपत्रों, व्यक्तिगतपत्रों, नामपट्टिकाओं, सरकारी कार्यालयों के पत्राचारों और कार्यों, सूचनाफलकों, समाचारपत्रों व इंटरनेट माध्यमों में हिंदी के अधिकाधिक उपयोग सुनिश्चित करना इत्यादि।
जबकि 10वें विश्व हिंदी-सम्मेलन, जो मप्र की राजधानी-भोपाल में हुआ था, उसके उद्देश्यों पर रोशनी डालते हुए भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि पिछले नौ सम्मेलनों की तुलना में 10वें का स्वरूप काफी बदला गया है। नौ सम्मेलन साहित्य केंद्रित रहा था, हमने इसे भाषा केंद्रित बनाया है। सम्मेलन की स्थापना हिंदीभाषा की उन्नति के लिए हुई थी। पहले सम्मेलन से ऐसा होता, तो आज हम वहां नहीं होते, जहां खड़े हैं। हिंदी के संवर्धन के साथ संरक्षण की भी चिंता कर रहे होते।
अब, जबकि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद का 1 जनवरी 2021 से दो साल के लिए अस्थायी सदस्य देश बन गया है; उम्मीद की जानी चाहिए कि वहां मौजूद उसके प्रतिनिधिगण इसपर ठोस कार्रवाई करवाएंगे और हिंदी को विश्वपटल पर प्रतिष्ठित करवाने में कोई लाग-लपेट नहीं रखेंगे।
यही नहीं, भारत सरकार को चाहिए कि भारत के भीतर हिंदी के विकास-विस्तार के लिए ठोस कार्रवाई करे। उन उद्देश्यों को फलीभूत करे, जो इसके सम्मेलनों से निकलकर सूत्रवाक्य बने हैं, लेकिन अभी तक जमीनी आधार ग्रहण करने के लिए छटपटा रहे हैं।
यह छटपटाहट तब और गहरा हो सकता है, जब राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के विचारों को बोधवाक्य की तरह अंगीकार किया जाए। उन्होंने कहा था,‘‘हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है, जिनके बल पर वह विश्व की सभी भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।’’
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