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बाल दिवस के लिए विशेषः बाल श्रमिक-वीरेंद्र देवांगना

बाल दिवस के लिए विशेषः
बाल श्रमिक
बस्तर संभाग में बारसूर है, जो इंद्रावती नदी के तट पर बसा है। कभी यह ऐतिहासिक नगरी हुआ करता था। यहां इंद्रावती नदी सात धारों में विभाजित है, जो सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है।
इसी प्राकृतिकस्थल के करीब एक खेत में धान कटाई का काम चल रहा है। इसमें बड़ों के साथ तीन बच्चे भी जुटे हुए हैं। तीनों के हाथों में छोटे-छोटे हंसिए हैं। वे बच्चे एक कतार में हैं। वे धान काटने में बड़ों का मुकाबला करने के लिए जल्दी-जल्दी हंसिया चला रहे हैं, ताकि उनकी बराबरी कर बराबर की मजदूरी ले सकें।
मेड़ पर खेत की मालकिन बैठी हुई है। उसकी नजर बारबार उन बच्चों पर जाकर टिक रही है कि ये बच्चे ठीक से धान काट रहे हैं या नहीं?
ये तीनों बच्चे सगे भाई हैं। कोई 14, 12 या 10 साल के आसपास होंगे। इन्होंने पढ़ाई-लिखाई छोड़ रखी है। बाप तो है नहीं, वह इनके बालपन में ही चल बसा है। मां है, लेकिन वह लंगड़ी है। पिछले साल वह लकड़ी काटने जंगल गई थी, तो भालू ने उसे ऐसा दौड़ाया कि वह एक पेड़ के खूंट से टकराकर लंगड़ाने लगी है। लाठी के दम पर चलती-फिरती है। कहना ना होगा कि इन मासूम बच्चों की कमाई से यह अभागा घर चल रहा है।
भारत के दूरदराज के गांवों, वनप्रंांतरों में ये दृश्य आम है। दूरस्थ अंचलों में ही क्यों, शहरों के पास के गांवों और महानगरों, नगरों, शहरों व कस्बों में भी मासूम बचपन रोजी-रोटी की तलाश में जुटा हुआ है।
वह कहीं होटलों में, कहीं गैराजों में, कहीं मोटर रिपैयरिंग सेंटरों में, कहीं किराने की दुकानों में, कहीं सिनेमाघरों में, कहीं ईट भट्टियों में, कहीं उद्यमों में अपने और अपने परिवार का पापी पेट पालने के लिए बालश्रम कर रहा है।
हमारा देश हरसाल पंडित नेहरू की याद में 14 नवंबर को बाल दिवस मनाता है। सब चाचा नेहरू को लेकर बड़े-बड़े भाषण देते हैं। बच्चों के साथ फूलों का आदान-प्रदान होता है। मालवा के एक गांव के सरकारी स्कूल में यही अवसर था, जब प्रधानाध्यापक ने एक आंठवीं के बच्चे को खड़े करवाकर उससे चाचा नेहरू के बारे में दो शब्द कहने को कहा।
बच्चा इससे असहज हो गया। इसका कारण यह था कि वह दिनों या कहें कि महीनों से कक्षा से अनुपस्थित था। वह इसे अपना अपमान समझा और तैश में बोला,‘‘इन बच्चों में मैं ही आपको अकेला क्यों दिखा सर? यह मैं जानता हूं। आप मेरी परीक्षा लेना चाह रहे हैं। लेकिन, आपको नहीं पता कि मैं अपना घर चलाने के लिए एक होटल में कप-बस्सी धोता हूं। यह मेरी मजबूरी है सर। मैं ऐसा न करूं, तो मेरे बीमार माता-पिता मर जाएं। मैं उन्हें मरता हुआ नहीं देखना चाहता सर।’’
यह है भारतीय बच्चों की हकीकत। यह स्थिति भारतभर में है। कोई माने या न माने, लेकिन अगर ध्यानपूर्वक व ईमानदारीपूर्वक उन स्थलों की तफतीश किया जाए, तो उन्हें रोज ऐसे सैकड़ों अभागे बच्चे मिल जाएंगे, जो पढ़ाई-लिखाई छोड़कर काम-धाम में जुटे हुए हैं।
यह उन देशों में और भी विकराल रूप में है, जो विकसित हो रहे हैं या अर्द्धविकसित हैं। इसका प्रधान कारण गरीबी है। अभावग्रस्त माता-पिता की यह विवशता है कि वे अपने बच्चों से काम करवाएं। सोचनीय बिंदु यह कि जिन घरों में दो जून की रोटी मयस्सर न हों, वहां बच्चा क्योंकर स्कूल की दहलीज लांधेगा?
आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में 26 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। इनमें से 16 करोड़ बच्चे बालश्रम करने पर विवश हैं। 8 करोड़ बच्चे ऐसे हैं, जो खतरनाक उद्योगों में काम करने के लिए लाचार हैं। वहीं, वे 15 करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जिनकी उम्र 5 साल से कम है।
दुनिया में 4 करोड़ बच्चियां ऐसी हैं, जिनका विवाह बालीउम्र में कर दिया जाता है। ये बच्चियां 14-15 साल की उम्र में कई-कई बच्चों की मां बन जाती हैं। सोचनीय पहलू यह भी कि जिनका तन-मन परिपक्व नहीं हुआ है, उनके बच्चे परिपक्व व तंदुरुस्त कैसे हो सकते हैं? नतीजतन इनके ज्यादातर बच्चे कुपोषित पैदा होते हैं। यह चक्र और दुष्चक्र सदियों चलता रहता है।
बच्चे मुल्क की धरोहर होते हैं। वे स्वस्थ व शिक्षित हैं, तो समाज व देश का स्वास्थ्य व शिक्षा-व्यवस्था दुरुस्त है। यही सच्चाई ‘वल्र्ड सेव द चिल्ड्रन’ रिपोर्ट में झलकती है। इसके प्रतिवेदन के मुताबिक दुनियाभर में बच्चों के लिए शानदार देश ये हैं, जहां बच्चों के बचपन को बचाने को खास तरजीह दी जाती है। इनमें सर्वप्रमुख हैं-नार्वे, स्वीडन, इटली, स्लोवेनिया, पुर्तगाल, बेल्जियम, फिनलैंड, आयरलैंड, सायप्रस, नीदरलैंड, आइसलैंड, जापान, जर्मनी, चीन, दक्षिण कोरिया और कांगो आदि।
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