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अदूरदर्शिता – अशोक सिंह

कहाँ है भेद लोगो में
ये झूठा दायरा क्या है ।
नहीं है रक्त मे अंतर
फिर मन क्यूँ बावरा सा है ।।

है झूठे धर्म के किस्से
जाति मे अंधी शक्ले हैं ।
घृणा है फैली कण-कण में
खामोश सबकी अक्लें हैं ।।

नहीं लड़ना यहाँ अच्छा
इन झूठों के पुलिंदों पर ।
नही है भेद हम तुम में
सकल अवनी बसिंदो पर ।।

इन कपटी साजिशों मे फिर
हम क्यूँ गुमराह रहते हैं ।
बाधे आँख पर पट्टी
लहू की चाह रखते हैं ।।

इस कट्टरता की चाबुक से
हमे खुद को बचाना है ।
रहें हम प्रेम से मिलकर
सपथ सबको दिलाना है ।।

Ashok Singhअशोक सिंह
आजमगढ़

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Ashok Singh

Ashok Singh

मैं अशोक सिंह गोरखपुर उत्तरप्रदेश का निवासी हूँ। मैं श्रृंगार रस का कवि हूँ।

9 thoughts on “अदूरदर्शिता – अशोक सिंह”

  1. आपने अपना विचार रखा ।। आपका आभार ।।

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