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गुरुदक्षिणा-अजय-प्रताप सिंह

रोशन सभी दीप है, प्रकाश से उद्दीप के ।
पुष्प लेकर सोचता ,सम्मुख खडा गुरुदेव के ॥
कैसे बॅधाई दूँ गुरु को ,क्या इन्हें उपहार दूँ,
सत्कार गुरु के योग्य है ,क्योंन इन्हें सत्कार दूँ ,
लाऊ कहाँ से वस्तु वो ,सत्कार गुरु का हो सके।
पुष्प लेकर … . . . . . . . . गुरुदेव के ॥
हर जन्म पाता रहूँ, गुरु की शरण मे आसरा ,
ज्ञान रस देते रहे, गुरुदेव यूँही मुस्कुरा ,
कैसे जलाऊं दीप मैं ,अंधकार का खुद दीप ये ।
पुष्प लेकर ……………. गुरुदेव के ॥
सब कुछ दिया गुरु देव ने ,गुरु ज्ञान का भण्डार है,
ईश से भी श्रेष्ठ हैं ,सरस्वती का प्यार हैं,
क्या इन्हें उपहार दूं, दिल को सताये सोच ये ।
पुष्प लेकर ……………… गुरुदेव के ॥
सद्‌बुद्धि का आँचल , विवेक ने आकर झंझोडा,
गुरु ज्ञान के आगे पड़ेगा, सरस्वती का ज्ञान थोड़ा,
प्रेम का संदेश पुष्प ,परोपकार का उपदेश ये ।
पुष्प लेकर …… . . . . . . . . गुरुदेव के ॥
महके वतन बनकर चमन , गुरुज्ञान से,
पाते रहे गुरु ज्ञान रस ,हम सदा उद्यान से ,
सोचकर एक पुष्प लाया ,तोड़कर उद्यान से ।
पुष्प लेकर ………… गुरुदेव के ॥
योग्य गुरु के कुछ नहीं ,हे गुरु संसार में ,
तुच्छ सी इस भेंट को ,हे गुरु स्वीकार लें,
छूकर चरण , शिष्य का अनुरोध है श्रीमान से ।
पुष्प लेकर ………….. गुरुदेव के ॥

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