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‘ जाग ‘जननी ‘जाग ‘-अजय-प्रताप सिंह-

मानव कितना सभ्य हो गया
यह तो मैं अब जाना हूं ।
क्या संगत का प्रभाव जगत में
अब जाकर पहचाना हूं ॥
वस्त्र विहीन असभ्य मानव था,
मुश्किल से तय किया सफर ,
आज सभ्यता विकसित है, ‘
वस्त्र विहीन नहीं होने दूंगा मैं ॥
माता ही प्राचीन काल से,
बच्चे का गुरु कहलाती है ।
निष्ठा ,सदाचार ,मानवता
और नैतिकता सिखलाती है ।
गर्वित गुण क्या लुप्त हो गए,
क्या पथभ्रष्ट हुई जननी,
जिम्मेवारी से हाथ झाड़ के,
हाथ नहीं धोने दूंगा मैं ॥
क्यों बच्चों में चंचलता ,
और कोमलता का ह्रास हुआ ।
माता यदि सही मार्ग पर है,
क्यों बच्चा अवगुण का ग्रास हुआ ।
अंधकार की गहरी खाई,
संस्कारों को डुबो चुकी ,
अंश शेष जो तैर रहे हैं,
उनको नहीडुबोने दूंगा मैं ॥
भावी भारत ऐसा होगा,
सोच के दिल घबराता है ।
उद्देश्य विहीन भटकता राही ,
ज्यों मंजिल नहीं चुन पाता है ।
धन लोलुप हो चुका है इतना ,
क्या कर दे कोई पता नहीं,
अंकुश अभी लगाना होगा,
अंकुश नहीं खोने दूंगा मैं ॥
कितनी लंबी रात्रि भले हो,
सूरज को उगना होगा ।
अलख जगाने आया हूं,
जन-जन को जगना होगा ।
भगिनी को अंधकार त्याग कर,
एक दिन तो भागना होगा,
बहुत खो चुके संस्कार खो ,
और नहीं खोने दूंगा मैं ॥
त्याग ,क्षमा ,गौरव, गरिमा
कुछ तो मां के प्रति बनता है ।
हुआ बहुत कुछ ,भूल गया सब
सोचा आखिर यह जनता है ।
हम भी सक्षम तुम भी सक्षम ,
द्वंद तभी तो ठनता है ।
संघर्ष त्याग दूँ ,अश्क बहाऊ,
क्या ऐसा भी होने दूंगा मैं ॥

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