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माँ की व्यथा – अविनाश सिंह

(इसमें मैंने माँ और बेटे के विभिन उम्र का चित्रण किया है और के ऊपर होने वाले अत्याचार को दर्शाया है )

अपने उम्र को मैने बढ़ते देखा,
माँ की उम्र को ढलते देखा।

खुद को मैंने निखरते देखा,
माँ के चहरे पे झुर्रियो को पड़ते देखा।

जब हमने जन्म लिया तब माँ की उम्र थी 25 साल,
हम माँ को समझ ना पाये,
आंख होते हुए भी माँ को इस उम्र में न देख पाये।

ये जहां मेरे सोच से भी दूर था,
माँ के आंचल में ही दुनिया का सब टूर(TOUR) था।

चलना सिखाया था माँ ने मेरी,
अपने दिल मे मुझे सजाई थीं माँ ने मेरी।

मुझे देख हर पल वो मुस्कुराई थी,
अपने सीने से हर पल मुझे लगाई थी।

मैं 5 साल का हुआ,
माँ ने मुझे “माँ” शब्द बोलना सिखाया,
सब कुछ छोड़ मुझे सही राह पे चलना सिखाया।

माँ के आंचल में मेरा परवान चढ़ने लगा,
वक़्त के साथ-साथ कद भी मेरा बढ़ने लगा।

10 साल का हुआ मैं,
माँ के खवाइशो का दमन करने लगा,
खुद के बुने ख्वाइस में मैं सब कुछ भूलने लगा।

माँ 35 साल की हो गई,
फिर भी मैं उसे ना समझ सका,
उसकी जिमेदारियो को समझे बिना,
मैं उससे ही जिद्द करने लगा।

खुद की बात मानने लगा,
माँ को नीचा दिखाने लगा,
अपना हुक्म जमाने लगा,
माँ को अब मैं रुलाने लगा।

धीरे-धीरे मैं जवान होने लगा,
सारा जहा मुझपे मेहरबान होने लगा।

मैं 20 का हो गया,
माँ 45 साल की हो गई,

देखते ही देखते मैं जवान हो गया
मेरे अवाज में गर्राहत आ गया,
माँ के अवाज में सन्नाहत छा गया।

मैं अब बड़ा हो गया
माँ का बुढ़ापा आ गया,
माँ 50 की हो गई,
मैं खुद सजने सवरने लगा,
माँ को मैं फिर भी ना समझा,
बात बात पे मैं उससे लड़ने लगा।

माँ बीमार पड़ने लगी
मैं खुद में बिजी रहने लगा,

माँ की बात बुरी लगने लगी,
बात-बात पे मै उसे टोकने लगा।

अब मेरी शादी हो गई,
माँ कि अब और बर्बादी हो गई,

फर्ज से मई अब और दूर होने लगा,
बिन आशीष लिए मै घर से जाने लगा
अपना कमरा मैंने अब अलग बना लिया,
माँ को बरामदे में सोने को मजबूर कर दिया।

अब माँ रातों को रोती है,
आंखों में आशु लिये वो सोती है,
अपनी धूमिल आंखों से सब कुछ देखती है,
गलती न होते हुए भी वो चुप सी हो जाती है।

आज मैं इस कदर लायक हो गया,
बीबी के बातो का मै कायल हो गया,
गहने मुझे सस्ती लगती,
माँ की दवा मुझे महंगी लगती।

उसके आभूषणो को बेच मैं पराक्रमी बन गया,
माँ को अलग कर मैं अब घर का मालिक बन गया।

भूल गया मैं वो सारा पल माँ के संग जो बीता था,
छोर गया मैं उस माँ को जिसके आँचल से मैं लिपटा था।

देख के सारा माजरा वो बस सिसकियाँ भरती थी,
कुछ न बोलते हुए बस ‘हे भगवान-2* बोला करती थी।

उनकी आँखों का भी मुझपे हुआ ना असर अब ,
देख के मुझको को हर पल वो नजरे चुराया करती थी,
मेरी गुर्रराहत के आगे वो कुछ बोल ना पाया करती थी।

धीरे-धीरे अब वो बोझ सी बन गयी,
सब कुछ होते हुए भी वो दुखी हो गयी।

घर का अब बंटवारा हो गया,
सब खुश हुए,बस माँ का दिल टूट गया।

सब कुछउसके खिलाफ होने लगा,
माँ कि जगह अब बीबी के संग फोटो लगने लगा।

इस अपमान को देख माँ सहन न कर पाई,
रोते बिलखते माँ कि अब तबियत भी बिगड़ गई।

दवा खाना छोड़ दिया,
अन्न से रिश्ता तोड़ दिया।

अब माँ बिस्तर पे लेती रहती थी,
आंख की पुतलियां बस हिला करती थी।

वक़्त चलता रहा वक़्त रुका नहीं
माँ के आँखों का आशु भी कभी सुखा नहीं।

माँ ने अब बोलना छोड़ दिया,
सबसे रिश्ता तोड़ लिया।

मैं आज भी उसपे चिल्लाने लगा,
अपना रोब उसे दिखाने लगा,
बीबी द्वारा लगाए गए लांछन उसपे लगाने लगा,

मै अब अपने में जीने लगा,
माँ के कर्तव्यों को भूलने लगा
मेरे गुस्से ने मेरे अक्ल को ख़तम कर दिया,
अब माँ न रही उसके लाश को देख मई उसे धमकाने लगा।

गुस्से में आके मैंने उसे लात मार दिया,
देखते ही देखते मैंने उसे भला बुरा कह दिया।

अब मेरा सब कुछ खत्म हो गया,
देखते ही देखते माँ का अंत हो गया।

चार लोगो से उसे कंधा दे मैंने उसे दफन कर दिया,
एक कफन देकर मैंने सारे आभूषण उसके छीन लिया।

खा गया मैं उसकी पूरी जिंदगी अपने इस कर्मो से,
बेच दिया मैंने अपने माँ को इन सारे बंधनो से।

Avinash Singhअविनाश सिंह
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

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Avinash Singh

Avinash Singh

मैं अविनाश सिंह गोरखपुर हरियाणा का निवासी हूँ। मैं श्रृंगार रस का कवि हूँ।

23 thoughts on “माँ की व्यथा – अविनाश सिंह”

  1. रजनीश

    माँ के पीड़ा का बखूबी वर्णन किया गया है।

  2. विनोद सिंह(वीनू)

    जो समझ गया माँ को इंसान से भगवान बन गया

  3. आनन्द तिवारी

    दिल झकझोर दिया….
    ये पल किसी माँ के जीवन में ना आए प्रभु से यही प्रार्थना..!!

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