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मायानगरी-अजय-प्रताप सिंह-

संस्कृति ,सभ्यता का
अद्भुत दर्शन थी ,
दयनीय दशा की
अभिव्यक्ति ॥

अविचल, अडिग,
सागर तट पर है,
तुफान प्रफु,
मायानगरी॥

कर्ज दूध का ,
सिन्दुर की कीमत,
और ईश्वर में,
आशक्ति।।

पाप – पुण्य का,
लेखा – जोखा,
धरती माँ की,
ऋण मुक्ति ।।

स्वाबलम्ब , दृढनिश्चय की ,
नींव जमाती ,
बल देती ,
बनकर शक्ति ॥

अपराध ,विवाद को ,
जन्म रही है ,
बेवश ,बन्धक
वह शक्ति ॥

घृणा ,द्वेष और
धन लिप्सा की ,
नई – नई ,
लायी युक्ति ॥

अपराध , नशे में ,
डूब चुकी है ,
इतनी सुन्दर,
इन्डस्ट्री ?

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