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परछाई अतीत की-अजय-प्रताप सिंह

जले जो आग में बने चिंगारियां
क्या न गुजरी कौन जाने कैसी दुश्वारियां ।
बनाया चमन त्याग कर अपनी खुशी,
हजारों रंग बो डाले बनाकर क्यारियां ॥
खून अपना था अश्क माताओं बहनों के ।
त्याग दिल के टुकड़ोंके मोह तज गहनो से ।
खिलेगा खुशबू और शान को चार चांद देगा,
लोग देखा करेंगे नाज से आजाद फुलवरियाँ ॥
कुछ कोपलें पनपी न थी ,मुरझाने लगीं ।
कोपलों में कांटों सी चमक आने लगी ।
झाड़ बन न जाए सोच कर दूर किया,
भुनाया सभी ने अपना हुनर देख लाचारियॉ ॥ बेरुखी झेलकर चमन यूही खिलता रहा ।
इत्र महकेगा यूं ही संदेश उन्हें मिलता रहा ।
अधूरी आस में तड़पते देह त्यागी,
आश्वस्त – हो विश्वास में पाते रहे गद्दारियां ॥
गए जो त्यागकर चोलाअमर है आत्मा उनकी ।
अधूरी थी अधूरी रह गई हर ख्वाहिश उनकी ।
तड़पती इत्र की फिराक में है बेचैन आत्मा ,
यहां तो खिल रही तेजाब की फुलवारियां ॥ आह हर सांस से निकली थी, हर सांस से निकलेगी ।
चैन से रह न सकोगे ‘ लाश हर आस की निकलेगी ।
लिया है कर्ज ,तो अदा करना होगा,
महक में इत्र हो , ऋण मुक्त हो ,करो तैयारियां॥

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