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राजनेता -अजय-प्रताप सिंह

देख भ्रष्टता पूर्ण समाज ‘
आत्मा बोली ‘हे बुद्धिराज ‘
राजनीति में कदम रखो ‘
भ्रष्ट बनो और करो राज । ।

पैसे दे पकड़े ,कुछ नेता ,
कुछ डाकू थे , कुछ अभिनेता ‘
मीटिंग बैठाई ,आपातकाल ‘
बनने को राजनीति विजेता ॥

समझाया दिल बहुत ‘न मेरी मानी ‘
दिल की बात तुम्हें ‘ पड रही सुनानी ‘
साथ मिले तुम लोगों का ‘तो एक बात कहूं ‘
रख राजनीति में कदम ‘इलेक्शन की है ठानी ॥

अपनी बुद्धि की परख देख ,
किया सभी से प्रश्न एक ‘
ऐसा कोई उपाय बताओ ,
हो जाए राज्याभिषेक । ।

देख सभी ने उत्सुकता ‘ अपने खीस निपोरे ‘
सुन वाणी को ‘सभी चहक कर बोले ‘
भ्रष्टता पार्टी का गठन करो ‘तुम नेताजी ,
भ्रष्ट पड़ेंगे भारी ,गर जाएं तौले ॥

अनशन करो हमेशा ‘कर्मठ के दरवाजे ‘
जला के पुतले ‘ छोड़ो खूब पटाखे ,
हाय -हाय चलाओ और खूब करो पथराव ‘
घुटनों के बल आएगा , कर्मठ शीश झुकाके ॥

जब तक जन-जन भ्रष्ट ना हो ‘
नेताजी तब तक चैन ना लो ,
देश भले ही भ्रष्ट कहाये ‘
तुम राजनीति का अंग बनो ॥

चुनाव चिन्ह गांधीजी रक्खो ,
उल्टा सीधा भाषण लिक्खो ‘
₹500 का नोट लोटा दो ,
स्वाद जीत का चक्खो ॥

कह भ्रष्टों की उठ चली बारात ‘
आत्मा बोली ‘हे !बुद्धि राज ‘
तुमसे यह भी नहीं बजेगा ‘
राजनीति का टेढ़ा साज । ।

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