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विद्रोह-अजय-प्रताप सिंह-

कर्तव्य गर विद्रोह है ,विद्रोह कर ,विद्रोह कर ।
जाए भले तेरी जिंदगी ,ना जिंदगी का मोह कर,

उठ खड़ा हो देश का ,डूबता अस्तित्व देख ,
पशु समय जीवन बुरा ,मृत्यु भी उसे है नेक ,
चट्टान बन इतनी बड़ी ,नदियां भी छोड़ दे डगर।
कर्तव्य गर विद्रोह है, विद्रोह कर ,विद्रोह कर ॥

संसार सब बसंत है ,हर एक यहां पतंग है,
उड़ गर्व से आकाश में, तू भी जहां का अंग है,
वायु को तो चीर दे ,राह में आए अगर ।
कर्तव्य गर विद्रोह है ,विद्रोह कर ,विद्रोह कर ॥

है कटीला गर चमन , प्रज्वलित कर नश्वर तन,
अंधकार का संहार कर ,दे उजाला दीप बन ,
उजड़े हुए श्मशान में भी, रोशनी आए नजर ,
कर्तव्य गर विद्रोह है, विद्रोह कर ,विद्रोह कर ॥

जीव में तू ज्येष्ठ है ,सब योनियों में श्रेष्ठ तू ,
विलक्षण गुणों से पूर्ण है , बुद्धि में विशिष्ट तू ,
क्यों जी रहा ,निर्जीव बन ,बिना लड़े जीवन _समर ।
कर्तव्य गर विद्रोह है, विद्रोह कर, विद्रोह कर ॥

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