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दीपावली पर विशेष व्यंग्य-लेखः उल्लू कहीं का-वीरेंद्र देवांगना

दीपावली पर विशेष व्यंग्य-लेखः
उल्लू कहीं का!
बचपन में उल्लू का महिमामंडन करते हुए जब गुरुजी मुझे डांटा करते थे,‘‘उल्लू कहीं का!’’ तब पहली बार एहसास होता था कि उल्लू कोई ऐसा प्राणी है, जो मूर्खों का पर्याय है। लेकिन, जब पिताजी भी यही कहकर छोटी-मोटी डांट लगा दिया करते थे, तब लगता था कि यह स्नेहसूचक कोई चीज हो सकता है, जो मूर्खता सूचक है।
जरा होश आया, तब पता चला कि उल्लू, माता लक्ष्मी की सवारी है, जिसकी पूजा हम भारतीय दीपावली में धन-धान्य की प्राप्ति के लिए श्रीलक्ष्मी के साथ किया करते हैं और मां लक्ष्मी से सुख-संपदा की कामना करते हैं।
वाकई जिन घरों में धन-संपदा भरी रहती है, उनके ‘थुलथुलेपन’ को देखकर लगता है कि वे लक्ष्मीजी को छोड़कर उल्लूजी की पूजा उसी तरह से करते होंगे, जैसे श्रीराम को पाने के लिए हनुमानजी को पहले खुश किया जाता है।
ऐसे लोगों के डीलडौलपन से लगता है कि वे आंख के अंधे व गांठ के पूरे इसलिए बन गए हैं कि इन्होंने श्रीउल्लू को श्रीलक्ष्मी से ज्यादा तवज्जो दे रखा है।
बहरहाल, उल्लू की आंखें बड़ी-बड़ी और डरावनी होती है। वह उसी तरह रात को जागता है और दिन में सोता है, जैसे ‘उल्लू के पट्ठे’ दिन में सोते हैं और रात को जागते हैं। अब, इन ‘उल्लू के पट्ठों’ को कौन समझाए कि रात को वही जागता है, जो उल्लू होता है। जिनके पास रात को काम रहता है, वे जागते हैं, तो समझ में आता है। लेकिन, जो बेकाम के जागा करते हैं, उनके उल्लूपने पर तरस आता है।
यदि उल्लू नहीं बनना है, तो रात को जल्दी सोना और सुबह जल्दी उठना चाहिए। वैसे यह आपकी मर्जी! क्योंकि कई बंदे उल्लू बने रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं।
पाश्चात्य देशों में देर से सोना और देर से जागना आम है, इसलिए वहां उल्लू को समझदार व बुद्धिमान पक्षी माना जाता है। भारत में इसके उलट क्यों है? यह शोध का विषय है। यदि भारत में ऐसा हो जाए, तो कोई ‘उल्लू कहीं का’ क्यों कहलाए?
यदि कहलाए, तो भी उसकी परिभाषा में आमूलचूल परिवर्तन हो जाए। वह जरा ‘उल्लू है जी’ कहने से उसकी समझदारी व होशियारी का बोध होने लगे, तो बात बन जाए।
खेद का विषय यह भी कि कई लोग उल्लू को उल्लू नहीं, अपितु लल्लू समझते हैं। तभी उसकी पूजा करने के बजाय श्रीलक्ष्मी की पूजा करते हैं। उनकी दलील है कि उल्लू, तो उल्लू ठहरा। उसकी पूजा क्यों करना भला?
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बाल दिवस पर विशेषः
चाचा नेहरू के स्वास्थ्य का रहस्यः
एक बार एक व्यक्ति पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिलने आया। बोला,‘‘यदि आप इजाजत देे, तो मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूं।’’
पंडित नेहरू ने पूछने की अनुमति दे देी। उस व्यक्ति ने कहा,‘‘आप इस उम्र में भी ताजे गुलाब की तरह स्वस्थ और आकर्षक लगते हैं, जबकि आपके ऊपर काम का बोझ ज्यादा है, पर आपको देखकर लगता है कि जैसे आप पर उम्र का कोई असर ही नहीं है।’’
यह सुनकर नेहरूजी हंसकर बोले-अरे भाई, यह तो बहुत ही सहज है। कोई व्यक्ति केवल तीन बातों पर ध्यान दे, तो वह भी हमेशा तरोताजा रह सकता है। पहली बात तो यह कि मैं बच्चों से घुल-मिल जाता हूं। बच्चों के साथ बच्चा बनकर खेलने में आनंद आता है और दिल को सुकून मिलता है।
दूसरी बात, मैं कुदरत के सुंदर दृश्यों से गहरा संबंध रखता हूं। पहाड़, नदी, झरने, पक्षी, चांद, सितारे, हरे-भरे जंगल और हवाएं भी मुझे ताजा रखती हैं।
तीसरी बात, ज्यादातर लोग छोटी-छोटी बातों में फंसकर तनावग्रस्त हो जाते हैं। मैं ऐसा नहीं करता। जिंदगी को लेकर मेरा नजरिया बिलकुल अलग हैं। जीवन है, तो समस्याएं भी होंगी। इसलिए सबका मुकाबला धैर्य और शांति से करें। यह जान लीजिए कि समस्याएं हमेशा रहेंगी। यदि हम उनसे डरकर तनावग्रस्त हो जाएं, तो हमारा जीवन संकटग्रस्त हो जाएगा।
नेहरूजी की बात से वह सज्जन संतुष्ट हो गए। फंडा यह कि जो व्यक्ति बच्चों के समीप रहे, प्राकृतिक नजारों को देखकर आनंदित हो और समस्याएं आने पर घबराए न, वह व्यक्ति हमेशा स्वस्थ रहता है और कार्य उसे थका नहीं सकता।
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बाल दिवस पर बालकथाःः
रमेश की होशियारी
10 वर्षीय रमेश यह बात अच्छी तरह समझने लगा था कि जीव-जंतुओं के लिए भोजन और पानी कितना जरूरी है। इसलिए, वह चिड़ियों व पशुओं को रोजाना दाना-पानी दिया करता था। इससे उसे कुछ फायदा हो, न हो, मन को शांति मिल जाया करती थी।
पशुओं व पक्षियों को दाना-पानी देना, उसके लिए वह खुशी थी, जिसके लिए वह हर प्रकार के कष्ट सहने के लिए तैयार था। वह सुबह-शाम तब खाना खाता था, जब पक्षियों व पशुओं को भोजन दे दिया करता था। यह उसकी आदत बन गई थी।
जब चिड़ियां फुदक-फुदककर तेजी से दाना चुगती थीं और दाएं-बाएं चालाकी से निहारती थीं कि कहीं कोई आ तो नहीं रहा है, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था। फिर कोटने में उड़ेले गए पानी में झटपट चोंच डालतीं थीं और चोंच उठाकर चुहकती थीं, तो रमेश प्रसन्नता से उछल पड़ता था।
ऐसी ही सुकून वह ‘बिल्लू’ व ‘पंडरू’ को रोटी व भात-साग चैन से खाते समय महसूस किया करता था।
तभी कोरोना वायरस का फैलाव हो गया। उसका घर से बाहर निकलना बंद हो गया, तो उसको चिंता सताने लगी कि मोहल्ले के आवारा कुत्तों के संग ‘बिल्लू’ और अनाथ गायों के संग ‘पंडरू’ को दाना-पानी कौन देगा?
चिड़ियों को तो वह दाना छत में देने लगा था, लेकिन ‘बिल्लू’ और ‘पंडरू’ को छत में चढ़ाकर दाना देना संभव नहीं था। उनके साथ अन्य कुत्ते और गाय भी रहा करतीं थीं, जिनके भूखे रहने का अंदेशा उसे होने लगा था।
वह सोचा करता था कि कोरोना संकट में ये बेजुबान जानवर भूखे-प्यासे ही मर जाएंगे। इंसान अपने-अपने घरों में दुबक कर अपना बचाव तो कर लेंगे, पर इन मूक जानवरों को खाना खिलाकर भूख से कौन बचाएगा?
जब उसको एक समय की भूख सहन नहीं होती, तब बेचारे मूक जानवरों का भूख से बुरा हाल हो रहा होगा। इन पशुओं और उनके मासूम बच्चों को दिन-दिनभर का भूख कैसे सहन होगा?
इन्हीं ख्यालों में खोया हुआ रमेश रातभर करवटें बदलता रहा। उसे रह-रहकर ‘बिल्लू’ और ‘पंडरू’ की याद सताने लगी कि भोजन के अभाव में वे दो दिन से भूखे रह गए होंगे? हे भगवान्! यह कैसी मुसीबत है, जो इंसान सहित निरीह जानवरों पर आन पड़ रही है।
वह तालाबंदी में चाहकर भी घर के बाहर निकल नहीं सकता था। उसका घर कस्बे के व्यस्त चैक पर था, जहां पुलिस का कडा पहरा था। पहरेदार किसी को भी सड़क पर निकलते देखते थे, तो उसको पकड़कर मुर्गा बनाते थे; मेंढक दौड़ करवाते थे या उठक-बैठक लगवाया करते थे।
उनके निशाने पर चुलबुल बच्चे थे। लेकिन, वे बड़ों को भी बख्सने के मूड में नहीं थे। पकड़ लेने पर वे बड़ों की आरती उतारते थे, फूल मालाएं पहनाते थे या सीने पर पोस्टर चिपकवा देते थे कि ‘मैं समाज का दुश्मन हूं।’ या फिर, इस तरह डंडे बरसाते थे कि शरीर में लाल-लाल चकते उभर आते थे।
इसे देखकर एक बार पड़ोसी महेश भैया जब घर से राशन के लिए निकला, तब वह अपनी पीठ पर पोस्टर चिपकवा कर निकला,‘‘मैं राशन और दवाई लेने जा रहा हूं। कृपया डंडे न बरसाएं।’’ …और पुलिस का डंडा उसके लिए खामोश हो गया था।
इसी बात से रमेश को सहसा एक तरकीब सूझी। वह अपनी मां से बोला,‘‘मम्मी, दादी मां कहती थी कि हमें सबसे पहले गाय और कुत्ते को भोजन करवाना चाहिए, फिर स्वयं खाना चाहिए।’’
‘‘हम यही तो कर रहे थे बेटा, पर कोरोना के डर ने हमें वैसा करने से रोक दिया है। अभी देख रही हूं, तो चैक पर आज भी पुलिस का कड़ा पहरा है। वे डंडे बरसाने के लिए उतावले हुए जा रहे हैं।’’ रमेश की मम्मी आटा को गूंथते हुए जवाब दी।
रमेश भी पुलिस के डंडे से खौफ खाता थी, इसलिए ‘‘ऊंह’’ के सिवाय कुछ नहीं बोल सका।
थोड़ी देर बाद उसकी मम्मी पैथन को गोली में बदलते हुए बोली, ‘‘पुलिसवाले भी क्या करें बेचारे? मई-जून की गरमी में अपना काम कर रहे हैं। यह उनकी लाचारी है। यह महामारी ही ऐसी है, जो एक-दूजे के संपर्क से फैल रही है। इसीलिए, घर में रहने की हिदायत लगातार दी जा रही है।’’
इस पर रमेश एक तरीका सुझाते हुए बोला, ‘‘मेरे पास एक तरकीब है ममा। कल महेश भैया जब राशन लेने घर से निकले थे, तब अपनी पीठ पर जो संदेश लिखवाए थे, उससे वे पुलिस के कहर से बच गए थे।’’
‘‘तो तुम्हारा इरादा क्या है?’’ दिनेश की मम्मी उसकी आंखों में आंखें डालकर पूछी।
‘‘यही कि ममा, मैं चाहता हूं कि मेरी पीठ व पेट पर भी वैसी तख्ती लिख दी जाए कि ‘‘मैं रमेश, भूखे ‘बिल्लू’ और ‘पंडरू’ को दाना-पानी देने निकला हूं। उन्हें आज भी खाना नहीं मिला, तो वे भूखे-प्यासे मर जाएंगे।’’
रमेश की मम्मी को उसकी तरकीब इसलिए पसंद आ गई, क्योंकि वह भी ‘बिल्लू-पंडरू’ को खाना खिलाने के लिए चिंतित रहा करती थी।
सो, यही किया गया। रमेश अपनी पीठ पर तख्ती का सुरक्षा कवच लगाया। मुंह में मुखौटा धारण किया। फिर अपने हाथों को सेनेटाइज किया।
रोटी का थैला व बाल्टीभर माड़-पेज लेकर वह शान से रोड पर निकल पड़ा। फिर ‘बिल्लू’ व ‘पंडरू’ को मोहल्ले में ढ़ूंढकर दाना-पानी दिया और घर लौट आया।
पहरेदार उसे अदा-से आते-जाते देखते भर रह गए। वे उसकी पीठ व पेट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे हुए संदेश को ध्यान से पढ़ते थे। वहीं, मन-ही-मन उसके सेवाभाव व हिम्मत की दाद दिया करते थे कि बालक कितना होशियार, दयालु व बहादुर है?
इस तरह उसे तसल्ली हुआ कि कोरोना काल में भी वह आवारा पशुओं का सहारा बन गया।
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