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व्यंग्य-कथाःः कोरोनाकाल में हुक्केबाज-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथाःः
कोरोनाकाल में हुक्केबाज::
देश पर इधर कोरोना का संकट छाया, उधर सोहन सहित हुक्केबाजों का हाल बेहाल हो गया। उन्हें रह-रहकर हुक्का गुड़गुड़ाने के ख्वाब आने लगे। हुक्का न मिलने से वे बड़बड़ाने लगे। उनके हाथ-पैर ढीले पड़ने लगे, गोया उनमें जान ही नहीं रह गई हो।
दिमाग सुन्न हो गया। अपना काम करना छोड़ दिया। घरवाले परेशान कि इन्हें कोरोना हो गया या हुक्काना। जैसे विपक्षियों के लिए समझ से परे है कि किसान के लिए कृषि विधेयक लाभकारी है या अलाभकारी, वैसे ही किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि इन्हें हो क्या गया है?
हुआ यूं कि जब से देश में लाकडाउन का ऐलान हुआ था, तब से गांजा मिलना, उसकी सप्लाई होना बंद हो गया था। पैडलर भूमिगत गए थे।
सोहन का कहना है कि यह तो हुक्केबाजों के साथ ज्यादती और जुल्म है। ऐसा जुल्म तो बैरी पाकिस्तान भी कथित जासूसों के साथ नहीं करता, लेकिन अपनी सरकार लाकडाउन कर अपनों के साथ कर रही है। वाह री सरकार! तेरा भी जवाब नहीं।
नशीले चीजों को तो कम-से-कम चालू रखना चाहिए था। इसके बिना नशेड़ी-गंजेड़ी जीएंगे कैसे? यह भी सोचना सरकार का काम है। है कि नहीं।
लाकडाउन की वजह से दुकानें बंद क्या हुईं? गुलजार बाजार सन्नाटे में तब्दील हो गया, जैसे भूतों का बसेरा हो गया हो। रेल, बस व टैक्सी के पहिए वैसे ही थम गए, गोया आपदा में थम जाया करती है। यातायात के साधनों का बंद होना, हुक्केबाजों के लिए कोढ़ में खाज साबित हो गया।
जो पुलिस सड़कों पर कभी-कभार दिखती थी और कोने में वसूली में मशगूल रहा करती थी, वह बीच सड़कों पर मुस्तैद हो गई, तो स्वाभाविक रूप से गांजा और तंबाकू दुकानों से गायब हो गया।
इन्हीं व्यथाओं से व्यथित होकर सोहन सहित मोहल्ले के हुक्केबाजों ने कलेक्टर के पास अपना दुःखड़ा रोने के लिए आननफानन में निकल पड़े।
वे कलेक्टर कक्ष में पहुंचे, तो इतने लस्त-पस्त हो गए थे कि उनके मुख से बोल ही नहीं फूट रहे थे। वे हांफते व खांसते हुए खरखराती वाणी में कुछ-कुछ बताने लगे, तो कलेक्टर ने उन्हें कोरोना का मरीज समझ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया।
पुलिस ने उन्हें जिला अस्पताल को सौंप दिया। इधर उनके घरवाले परेशान कि हुक्का चैकड़ी कहां गायब हो गई? पर, चैकड़ी उधर अस्पताल में हलाकान थी।
अस्पताल में पता चला कि डाक्टरों व नर्सों को भी कोराना हो गया है। वे छुट्टी पर चले गए हैं। लेकिन, वार्डब्वाय है कि उनको एक बैंच में दिन-दिनभर बैठाए हुए था और जांच करने की धमकियां दिया करता था। इससे उनके हाथ-पांव फूल रहे थे। वे थर-थर कांप रहे थे।
वार्डब्वाय इतना कर्तव्यपरायण था कि वह उन्हें एक इंच भी हिलने नहीं दे रहा था। जबकि वे बता-बताकर परेशान थे कि कोरोना ने उनका हुक्का-पानी बंद कर रखा है। उन्हें हुक्का चाहिए। कोरोना की जांच नहीं। लेकिन, वार्डब्वाय मानने को तैयार नहीं था।
जब वार्डब्वाय बाथरूम चला गया, तब वे उठकर वहां से गिरते-पड़ते ऐसे भागे कि सोहन का पैर सड़क के उस गड्ढे में जा फंसा, जिसमें कई वाहन सवारियों की जान लेने का रिकार्ड बना हुआ है।
वह उसको जोरों से निकालने ही लगा था कि सोहन की तंद्रा टूट गई। वह सोते से उठ बैठा और हुक्का न मिलने के लिए बैठकर सरकार को कोसने, रोने व बड़बड़ाने लगा।
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विशेषटीपःःamazon.com/virendra dewangan में जाकर वीरेंद्र देवांगन की ई-किताबों का अध्ययन किया जा सकता है।

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