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व्यंग्य-कथाःः आलावजीर-जनरल वार्तालाप-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथाःः
आलावजीर-जनरल वार्तालापःः
जब अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकियों पर कार्रवाई के लिए चेतावनी दिया, तब पाकिस्तानी आलावजीर के माथे पर चिंता की लकीरें खींच आई।
वह अपने जनरल को फोन पर दर्देदिल बयां किया, ‘‘जनरल, कठिन वक्त आ गया है। एक ओर कुआं, दूसरी ओर खाई नजर आ रहा है। जंग करते हैं, तो पैदाइशी बैरी अपनी ताकत से फजीहत कर सकता है। दुनिया में हमारी छीछालेदर हो सकती है।’’
फिर उन्होंने आगे-पीछे ऐसे निगाह डाला, गोया कोई सुन तो नहीं रहा है। जो चीनी जासूस हो और चीन को उसके खिलाफ भड़काने का काम करता हो।
जब उसे तसल्ली हुई कि यहां कोई जासूस नहीं है, तब वह धीरे से बोला, ‘‘ड्रेगन बिन पेंदी का लोटा है। मौका परस्त, कमबख्त! कभी वकालत करता है, कभी खिलाफत। जंग की दशा में वह तटस्थ रहेगा। पक्का है। जंगबंदी करते हैं, तो आतंकी मुल्कबंदी का ऐलान कर सकते हैं सेनापति।’’
‘‘बजा फरमाया, सर।’’ जनरल ने पहले पीड़ा व्यक्त किया। तत्पश्चात आलावजीर से इत्तफाक जताया, ‘‘लगता है पासा पलट गया है सर। हमारे मंशूबों पर ‘एक चायवाले’ ने पानी फेर दिया है सर। कश्मीरी वादियों में हरा झंडा फहराने का ख्वाब धरा-का-धरा रह गया है सर।’’
‘‘वो कैसे? आलावजीर ने अचरज से पूछा।
‘‘वो ऐसे कि आतंक के आका (ओसामा बिन लादेन) को समुद्र में डुबो दिए जाने से दुनिया पर राज करने का हमारा ख्वाब मिट्टी में मिल गया है सर।’’जनरल ने अफसोस जताया।
फिर वह व्हीलचेयर में आहिस्ते से विराजा और उम्मीद जताया, ‘‘आप भरोसेमंद रहें सर। हमारी आईएसआई, सिरफिरे उग्रवादी, नमकहराम अलगाववादी व हिंदुस्तानी जयचंदी नेता; हिंदुस्तान को बरबाद व पाकिस्तान को आबाद देखना चाहते हैं। अल्लाताला के घर देर है, पर अंधेर नहीं सर।’’
इस पर आलावजीर ने कुटिलता दिखाया, ‘‘हम इस बेवकूफ पड़ोसी से तो बाद में भी निपट लेंगे। वह न केवल दोस्ती; अपितु सुकून भी चाहता रहता है। हमारी चिकनी चुपड़ी बातों में फंसकर वह बेवकूफों-सा वार्ता की मेज पर आता-जाता रहता है। यही रिकार्ड रहा है उसका।’’
फिर खुशी जताकर बोला, ‘‘उसके पूर्ववर्ती शासक खालिश मूर्ख थे, मूर्ख। उनको मुंह में राम, बगल में छुरी का भावार्थ नहीं मालूम था, जिसमें हमने महारथ हासिल कर रखी है। इसलिए हमें इस मूर्खिस्तान से कतई डर नहीं, है जनरल।’’
‘‘जी-जी। हकीकतबयानी है, सर!’’जनरल ने हामी भरी और टेबल में रखे गिलास के पानी को मुंह कसैला कर दो घूंट पीया।
फिर चैन से लंबी-लंबी सांसें लेकर मुंह खोला,‘‘उसकी पूर्ववर्ती सरकारें अच्छी थीं, जो हर आतंकी हमले के बाद फखत श्रंृद्धांजलि संभाएं किया करती थीं। मातम मनाया करती थीं। घड़ियाली आंसू बहाया करती थीं।’’
‘‘सही समझा तुमने। लेकिन, अब की सरकार हाथ घरने नहीं दे रही है। वह चढ़े जा रही है। कभी सर्जिकल स्ट्राइक कर रही है, कभी एयर स्ट्राइक। ऊपर से अपने लोगों में राष्ट्रवाद का जहर घोल रही है।’’ आलावजीर ने असल समस्या बयां किया।
‘‘सही पकड़े है सर। समस्या की असल जड़ यही है।’’ जनरल ने उसकी बातों से इत्तफाक रखते हुए कहा।
इस पर आलावजीर बोला, ‘‘समस्या यह भी कि हम जिनसे डालर, येन, पौंड लेकर इतराते थे; वे रुठ गए हैं। अमेरिका को देखो। वह पहले जन्मजात बैरी से निपटने के वास्ते अस़्त्र-शस्त्र दिया करता था। अब, खफा हो गया है। आंखें दिखा रहा है। बोलता है कि न हथियार मिलेगा, न डालर।’’
फिर गहरी सांस लेकर हाथ ऊपर उठाया और पीड़ा व्यक्त किया, ‘‘जापान ने भी मदद बंद कर दी है। वह दीगर मुल्कों को भी भड़का रहा है कि वे ना‘पाक’ से तौबा कर लें।’’
‘‘सही खबर है सर। रूस ने भी जवाब दे दिया है। उसने हमारे सैनिकों के साथ सैन्याभ्यास से इंकार कर दिया है। अब तो टुच्चा अफगानिस्तान, पिद्दी सा भूटान, लुच्चा पूर्वी पाकिस्तान दुश्मन की हां-में-हां मिला रहे हैं।’’ जनरल का भी दर्द छलक पड़ा।
फिर तनिक रुककर हामीं भरा, ‘‘यह ‘छप्पन इंची सीना’ हमें कहीं का नहीं छोड़ रहा है सर। हमारे लिए तो मूर्खिस्तान की खडुस सरकारें अच्छी थीं, जो चिकनी चुपड़ी बातों में फंस जाया करती थीं।’’
तभी उसको पूर्वजों की याद आ गई। वह उनको यादकर शेखी बघारा, ‘‘खुदा खैर करे सर! आज हमारे पास चंगेज खां, तैमूरलंग या नादिरशाह होते।. या होते मुहम्मद गजनवी या गौरी, तो हम इसे नाकों चने चबवा देते। कायदे आजम ही होते, तो इसको समुद्र में डुबो देते। पितामह याहया खा, टिक्का खां या अयूब खां ही होते, तो इसकी ईंट से ईंट बजा देते, सर।’’
इस पर आलावजीर ने नापाक मंशा जाहिर करते हुए कहने लगा, ‘‘हमारी सेना सीधी लड़ाई में कभी नहीं जीती। इसलिए, हमने आजादी के वास्ते जिहादी पाल रखे हैं। खूनखराबा व बलवा करवा रहे हैं। कश्मीर तो बहाना है, असल मकसद बैरी को लहूलुहान करते रहना है।’’
इन दोनों में मोबाइल पर इतनी ही चर्चा हो पाई थी कि पीओके, गिलगिट, सिंध प्रात में आजादी के नारे गूंजने लगे।
बलूचिस्तान की आजादी के तराने कनाडा व ब्रिटेन की हवा में तैरने लगे। आजादी के लिए भारी मात्रा में लोग सड़कों पर नारेबाजी करने लगे।
इसे लेकर पड़ोसी हुक्मरानों के दिल की धड़कन बढ़ गई। उनके माथे पर पसीने की बूंदे छलछला आई। वे फौरन फोन कटआफ कर दिए।
उधर इस्लामाबाद सहित लाहौर, कराची, रावलपिंडी में बम धमाके आरंभ हो गए। पता चला कि ये बम धमाके पाले-पोसे अतिवादियों की साजिश का नतीजा है।
वे भस्मासुर बन चुके हैं। वे जिस थाली में खा रहे हैं, उसी में छेद कर रहे हैं। जिस जमीन में पनपे हैं, उसे ही नेस्तनाबूत कर रहे हैं।
अतिवादी कभी नहीं चाहते कि दोनांे पड़ौसी अमनचैन से रहें। वे अमन के दुश्मन सदा बने रहें। यही ख्वाहिश है उनकी।
वे तो यहां तक चाहते हैं कि दोनों में युग-युगांतर तक लड़ाइयां होती रहें, ताकि 1947 के विभाजन का बदला और 1965, 71 व 99 की पराजय का खुन्नस निकाला जा सके।
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विशेष टीपःः वीरेंद्र देवांगन की ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome से जाकर amazon.com/virendra Dewangan में देखा जा सकता है।

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