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व्यंग्य-कथाःः बच गया लंकेश-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथाःः
बच गया लंकेशःः
दशहरा पर आयोजित सर्वधर्म सभा में रावण-दहन पर मतैक्य नहीं हो सका। सभापति भी यही चाहते थे, ताकि इस साल रावण का टंटा ही टूट जाए। कर्मचारी-अधिकारी कोरोना से लड़ेंगे कि दशानन-दहन कार्यक्रम से।
उनकी सोच थी कि एक साल रावण नहीं जलेगा, तो कौन-सा आफत आ जाएगा? अभी कोरोना महामारी से तो लड़ लिया जाए।
उच्चस्तरीय सभा में एसडीएम सभापति होने के नाते बड़ा-सा मास्क पहनकर पधारे थे, तो तमाम पार्टियों के नेतागण और धर्म-कर्म में विश्वास रखनेवाले धर्मालुजन मास्क पहनना अपना तौहीन समझते हुए शिरकत किए हुए थे।
कुछ लोग दिखावे के लिए गले में मास्क लगाए थे, उनका नाक व मुंह खुला हुआ था। कई बगैर मुखौटाधारण कर ऐसे बैठे हुए थे, जैसे कोरोना से उनकी दोस्ती-यारी हो।
वे मुखौटे को जेब में धरे हुए थे, ताकि दिखा सकें कि वे भी जागरूक हैं। कई लोग समझाने के बावजूद दो गज की दूरी का पालन इसलिए नहीं कर रहे थे कि इससे स्वच्छंदता में आंच आती थी।
एसडीएम ने सभा का आरंभ किया, तो एक संतनुमा नेता ने एसडीएम के सिखाए अनुसार कहा,‘‘जिस दुराचारी और व्यभिचारी रावण को भगवान राम मार चुके हैं, उसको तुच्छ मानवों के द्वारा बार-बार मारकर कौन-सा तीर मारा जा रहा है। इससे बांस-बल्ली, कागज-कपड़े, बम-पटाखे व समय-श्रम की बरबादी के सिवाय और क्या हासिल होता है? उधर रावण मरता नहीं और इधर रावणी आचार-विचार और व्यवहार हावी होने लगता है।’’
कथन से तीर में तुक्का लगा। सभी सभासद कथन से सहमत दिखे। वे क्षेत्र में कोरोना पर सरकारी लापरवाही से बेहद खफा थे, इसलिए आज अपना भड़ास निकाल ही लेना चाहते थे।
एक टोपीधारी नेता ने कहा,‘‘पहले क्षेत्र के क्वारेंटाइन सेंटरों की दुर्दशा पर बात कर ली जाए। कहीं भोजन नहीं हैं, कहीं शौचालय नहीं है। अरे भई, आदमी खाएगा, तो कहीं-न-कहीं उगलेगा ही। पानी है, पर उसकी स्वच्छता की गारंटी नहीं है। मच्छर हैं कि हर समय काट खाने को व्याकुल रहते हैं। पंखा है, पर चलता नहीं है। बाल्टी, मग, गिलास, साबुन ये तो बेसिक चीजें हैं, परंतु सब हैं नदारद। ऐसे में कोरोना से कैसे लड़ेगी सरकार?’’
विषयांतर होता देखकर एसडीएम ने कमान संभाली,‘‘सरकार से जो बन पड़ रहा है, कर रही है, लेकिन आप क्या कर रहे हैं? इसी सभा में 80 प्रतिशत लोग बिना मास्क के हैं। हाथ कंगन को आरसी क्या? स्वयं निहार लीजिए। कोरोना से लड़ने का ठेका क्या केवल सरकारें ले रखी हैं? आपकी कुछ जिम्मेदारी नहीं है।’’
इतना सुनना था कि जो पुलिसवाले एसडीएम की सुरक्षा में थे, वे गन उठा लिए। इसका लाभ यह हुआ कि जिन लोगों ने जेब में मास्क रखा था, वे फटाफट निकालकर पहनने लगे। इससे एसडीएम का मन तसल्ली से भर गया कि उसकी धौंस काम कर गई।
सबने एक दूसरे को देखा, तो दूसरा पटा-पटाया हुआ साधु कहने लगा,‘‘इस साल हम कोरोना को ही रावण समझकर मार लें, तो बड़ी बात होगी। कोरोना ने जो कहर ढाया है, वह किसी लंकापति के खौफ से कमतर नहीं है। इससे खकपति ही नहीं, करोड़पति भी दहशतजदा हैं। दुष्ट कोरोना कब किसको निगल ले, कोई नहीं जानता।’’
‘‘सही है।’’ कहकर सबने हामी भरी।
इस बीच एक कारोबारीनुमा शख्स ने सवाल उठाया, ‘‘जिसके टाल से बांस-बल्ली और दुकान से कागज-कपड़ा और बम-पटाखा रावण-दहन समितियां यह कहकर उधारी ले गई हैं कि लंकेश मरने के बाद उनका पाई-पाई चुका दिया जाएगा, उन रावणी, कंुभकर्णी व मेघनादी पुतलों का क्या होगा? रावण मरे या न मरे; बेचारे प्रतिमाकार भूखे मर जाएंगे।’’
‘‘इसकी चिंता आप न करें। पुतलों को पुतला शिल्पियों के बाड़ियों में ही रहने दें और उनकी सूची बनाकर एसडीएम कार्यालय में दे दें। कोरोना समाप्ति के उपरांत क्षेत्र में राजनीतिक दलों के द्वारा जब किसी नेता का पुतलादहन किया जाएगा, उसमें एसडीएम का ही परमिशन लगेगा। इसलिए, उसका इस्तेमाल हम करवा लेंगे और दलों से पैसा वसूलकर आपको दे देंगे।’’
‘‘वाह क्या धांसू आइडिया है।’’ सबने एसडीएम के तात्कालिक निर्णय की भूरि-भूरि प्रशंसा की और चाय-नाश्ता कर चलते बने। फिर उन पुतलों का क्या हुआ, किसी को कुछ नहीं पता, लेकिन क्षेत्र में दशानन-दहन नहीं हुआ, सो नहीं हुआ।
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