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व्यंग्य-कथाःः हम नहीं सुधरेंगे-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथाःः
हम नहीं सुधरेंगेःः
एक सीधे सवाल के जवाब में उसने टेढ़ा जवाब दिया,‘‘हम नहीं सुधरेंगे!’’
‘‘क्यों? क्यों नहीं सुधरेंगे आप?’’इससे चिढ़कर पत्रकार ने तीखा सवाल इसलिए दागा कि वह लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष देखना चाहता था।
‘‘वो इसलिए कि हमारी पार्टी अंग्रेजों के जमाने की है। जब अंगे्रज नहीं सुधरे, तो हम खाक सुधरेंगे?’’ उसने बांह चढ़ा लिया। भौंहें तान दिया।
पत्रकार घाघ था। वह आसानी से पीछा छोड़नेवालों में-से नहीं था। उसने कहा,‘‘देश की खातिर सुधरो। देश को एक मजबूत विपक्ष की जरूरत है। उस लिहाज से सुधर जाओ भिया।’’
‘‘हमारे पूर्वजों ने क्या विपक्ष में रहने के लिए लाठी-गोली खाईं हैं? इतिहास गवाह है कि हमने ‘यूनियन जैक’ को उखाड़ फेंका है? इसलिए, सरकार में रहना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। हमने जिस तरह ‘यूनियन जैक’ को उखाड़ा है, उसी तरह ‘कमल’ को भी उखाड़कर फेंक देंगे।’’ उसने वैसे ही शान दिखाया, जैसे अपने भाषणों में दिखाए करते हैं।
‘‘वो कैसे?’’पत्रकार चकित होते हुए पूछा।
‘‘वो ऐसे कि हमने पहले पार्टी को दुरुस्त करने का बीड़ा उठाया है। चिट्ठीबाजों को एक-एककर निपटाया है। अब हम उन सबको सबक सिखाएंगे, जो मां-बेटे की राह में रोड़े अटकाया करते हैं। उन्हें घुट्टी में पी लेना चाहिए कि हम हैं, तो पार्टी है; हम नहीं, तो पार्टी का कोई वजूद नहीं है। उन्हें तो बस नौकर-चाकर की तरह हुक्म बजाना है।’’ उनने जेब में वैसे ही हाथ डालते हुए कहा, जैसे 15 लाख रुपया खाता में नहीं आने का रोना रोते समय डाला करते हैं।’’
‘‘इससे क्या लगता है कि आपकी पार्टी खोया हुआ जनाधार हासिल कर लेगी?’’ पत्रकार ने फिर तीखा सवाल दागा।
‘‘…और नहीं, तो क्या? विरोधियों व असंतुष्टों को ठिकाने लगाने से ही पार्टी में असल लोकतंत्र आएगा। कचरे छंटेंगे। साफ-सफाई होगी, तभी तो पार्टी की कायापलट होगी। सूरत बदलेगी, तो सेहत खिलेगी भइया।’’
‘‘यह तो मुंगेरेलाल के हसीन सपने सरीखा हुआ।’’ पत्रकार ने उनकी कामयाबी पर शंका जाहिर करते हुए कहा।
‘‘आपको सपना लगता है, तो लगे। हम दूसरों के सपनों के लिए नहीं, कुर्सी हासिल करने के लिए राजनीति करते हैं। हम बारबार हारकर भी तब तक हार माननेवालों में-से नहीं हैं, जब तक सत्ता हासिल न हो जाए। हम उस खानदान के खानदानी लोग हैं, जिसके खानदान में एक नहीं, कई-कई नेता हुए हैं। जैसे घूड़े के दिन फिरते हैं, वैसे हमारे दिन भी फिरेंगे।’’
इसपर पत्रकार उसी के कथन को दोहराते हुए बोला,‘‘लगता है आपलोग नहीं सुधरेंगे।’’
‘‘क्यों सुधरेंगे भइया? जब देश की जनता नहीं सुधरी, तमाम विसंगतियों के बावजूद हमें राज्यों में बहुमत दिलाती रहती है, तब सुधरने का सवाल ही नहीं उठता। जैसी प्रजा, वैसा राजा हैं हम। हम ठहरे खानदानी राज करनेवाले लोग।’’
‘‘इसमें कोई शक नहीं कि आपलोग खानदानी शासनकर्ता हैं, लेकिन दुबारा सत्ता हासिल कर लेंगे, इसमें जरा संदेह है।’’ पत्रकार ने फिर सवाल किया।
इस पर वह तैश में बोला, ‘‘देखना एक दिन हम तब सत्ता में आएंगे, जब इस सरकार के भाषणों से जनता ऊब जाएगी।’’
इतना कहकर वे उसी तरह उठ खड़े हुए, जैसे आधे-अधूरे विचार व्यक्त कर हमेशा उठ जाया करते हैं।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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