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व्यंग्य-कथाःः ‘माल’ः एक खोज-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथाःः
‘माल’ः एक खोजःः
पड़ोसी ने मुझसे पूछा, ‘‘भइया, ‘माल’ है क्या?’’
मैंने हैरानी से कहा, ‘‘कैसा ‘माल’? कौन-सा ‘माल’?’’
‘‘अरे, माल नहीं जानते। आजकल गली-मोहल्लों में इसकी खूब चर्चा है। आप रहते कहां हैं भइया?’’मेरे द्वारा अनभिज्ञता जाहिर करने पर उसने मेरी अज्ञानता का मजाक उड़ाते हुए पूछा।
‘‘ससुरी कोराना ने घर में कैद कर रखा है, इसलिए बाहर कहीं नहीं जाता। खिड़की-दरवाजा बंदकर घर में पड़ा रहता हूं। इसलिए, माल-वाल मुझे नहीं मालूम।’’मैंने सहजता से जवाब दिया।
‘‘घर में रहता हूं का मतलब! बड़े भोंदू बसंत हैं आप! क्या पेपर नहीं पड़ते? टीवी नहीं देखते?’’
‘‘पेपर व टीवी से कोरोना घर में आ सकता है, इसलिए एहतियातन बंद कर रखा हूं।’’
‘‘विपक्षियों की तरह समझकर भी नासमझ बन रहे हो भइया। यह लोकतंत्र के सेहत के लिए अच्छा नहीं है। दुष्ट कोरोना तो कहीं से भी आ सकता है। किस-किससे बचेंगे आप? बस, दाल-रोटी खाते रहे, प्रभु के गुण गाते रहो। योग व प्राणायाम करते रहो, काढ़ा पीते रहो और टीवी देखकर ‘माल’ की जानकारी लेते रहो। ‘माल’ ने ‘बालीवुड’ में किस तरह से तहलका मचा रखा है, यह भी तो जानो।’’
‘‘अच्छा…छा…छा। बताओ, तो सही, क्या है ये ‘माल’?’’ मैंने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा।
‘‘बालीवुड की भाषा में हशीश, चरस, अफीम, गांजा, भांग आदि को ‘माल’ कहा जाता है। इसको अभिनय का स्वांग रचनेवाले लोग सेवन करते हैं और दर्शकों को मूर्ख बनाते हैं।’’ उसने लगभग उछलते हुए कहा।
‘‘इस जमाने में इसका सेवन करना और एक-दूसरे को मूर्ख बनाना आम बात है। राजनीतिज्ञ देश की जनता को बेवकूफ ही बनाते, तब उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। यह बताओ-इसमें नया क्या है?’’ मैंने अपनी जिज्ञासा बढ़ाते हुए फिर पूछा।
‘‘दिशा सालियान और सुशांत सिंह की मौत की गुत्थी सुलझाने के लिए एनसीबी ‘माल’दार और ‘माल’दारिनों के तह तक जाना चाह रही है। पहले वह ‘हेरोइन’ के पीछे भागा करती थी, अब ‘हीरोइनों’ को भागने के लिए मजबूर कर रही है। इससे हीरो-हीरोइनों का नशा हिरण हो गया है। वे ‘दम-मारो-दम’ से दूर भागने लगे हैं।’’
इतना सुनना था कि मेरी जिज्ञासा बढ़ गई। मुझे लगा कि मुझे अपना टीवी आन कर देखना चाहिए कि देश-दुनिया में क्या चल रहा है? कोरोना के डर से टीवी आफ रखने से तो दुनिया में मैं पिछड़ जाऊंगा। सो, मैंने टीवी आन कर दिया।
वाकई, उसमें बालीवुड के लिए ‘ड्रग्सवुड’, ड्रग्सलीला, ड्रग्सनगरी जैसे उच्च उपमाओं का इस्तेमाल किया जा रहा था। नशेड़ी, गंजेड़ी व भंगेड़ी जैसे शब्दों से ‘माल’ का वाकिया पूरे जोश-ओ-खरोश से परोसा जा रहा था। ‘थाली में छेद और माल का भेद’ जैसे ताजातरीन मुहावरे उछाले जा रहे थे।
इसको देखने-सुनने के बाद मुझे लगने लगा कि मैं ‘माल’ का विशेषज्ञ बननेवाला हूं। अब, मुझे पड़ोसी से ‘माल’ को लेकर चर्चा करने में कोई झिझक नहीं हो रही थी।
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विशेष टीपःः लेखक की ई-किताबों का अध्ययन amazon.com/virendra Dewangan के माध्यम से भी किया जा सकता है।

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