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व्यंग्य-कथाः मदारी और जमूरे के बीच संवाद-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथाः
मदारी और जमूरे के बीच संवाद::
‘‘बोल जमूरे?’’ मदारी ने डंका बजाकर जमूरे से पूछा, ‘‘ढम, ढमा-ढम, ढम।’’
जमूरे व्यथित मन जवाब दिया,‘‘क्या बोलूं उस्ताद? वैश्विक चैधरी से पैदाइशी दुश्मन धमकी दिलवाया है कि बंद करो ये खूनखराबा। आप जानते हैं कि हमारे यहां आतंकी नहीं, आजादी के सिपाही रहते हैं। वे कश्मीर में आजादी की जंग लड़ रहे हैं। आजादी के इन दीवानों को आतंकी कहना अन्याय है उस्ताद।’’
‘‘अच्छा…छा…छा! तुम्हीं ने तो अमेरिका में कबूला था कि तुम्हारे यहां 30-40 हजार आतंकी रहते हैं। तुम तो इतने बेवकूफ हो कि खुद अपनी बातों में फंस जाते हो।’’ उस्ताद डपटा।
‘‘मैं हैरत में हूं कि मेरी जुबान कैसे फिसल गई? जबकि वे आतंकी नहीं, आजादी के दीवाने हैं। कसम से’’ जमूरे ने कान पकड़कर अपने कथन की सत्यता साबित करने का प्रयास किया।
उस्ताद ने जमूरे को दिलासा दिया,‘‘हमारे रहते ‘टुम’ चिंता मत करो। हम सारे आतंकवादियों को सर्टिफिकेट दे देंगे कि ये लोग अच्छे किस्म के आतंकी है। ढम-ढमा-ढम।’’
फिर जरा रुककर उस्ताद फरमाया,‘‘टुम’ बोलो, तो हम संयुक्त राष्ट्र में फिर से विटो कर पक्की दोस्ती का सबूत पेशकर दें। सारी दुनिया को जता दें कि आतंक के मामले में भी हम ‘टुम्हारे’ साथ हैं।’’
ढम-ढम। उस्ताद डंका बजाकर उस्तादी दिखाया, तो जमूरे की जान में जान आया। वह फूला नहीं समाया।
सांत्वना की बातें सुनकर जमूरे, उस्ताद के पैर पकड़ा और गिड़गिड़ाया,‘‘इस मतलबी जहां में आप ही पालनहार व खेवनहार हैं! आप हमें रास्ता बताएं कि हम कौन से काम करें कि दुश्मन भी मरे और लाठी भी न टूटे।’’
‘‘हम डोकलाम के ‘चिकन नेक’ पर कब्जा जमाने की कोशिश में जुटे हैं। डोकलाम में मुर्गी की गरदन पर पकड़ हो जाएगी, तो जानी दुश्मन की अकड़ ठिकाने लग जाएगी।’’ उस्ताद शागिर्द की औकात भांपकर बोला।
फिर जेब में हाथ डाला, ‘‘जब अकड़ू बैरी को उसके उत्तरपूर्वी राज्यों में कूक-डू-कूं करने का अवसर नहीं मिलेगा, तब देखना, यह ऊंट मुझ पहाड़ के नीचे यूं आएगा, जैसे छोटे पड़ोसी देश आते-जाते रहते हैं।’’
अबकी जेब से हाथ निकालकर उसकी ओर देखा, ‘‘इस बीच ‘टुम्हारे’ राजदूत हमारे राजदूत से मिलने की दिखावटी सक्रियता दिखाते रहेंगे। फिर देखना तमाशा। कैसा बावेला मचता है?’’ उस्ताद ने ढम-ढमा-ढम बजाकर दंभ भरा।
उस्ताद की उस्तादी देख जमूरा फूला नहीं समाया। वह खुशी से झूमते हुए बोला,‘‘वाह उस्ताद वाह! आपके क्या कहने? आप तो उस्तादों के उस्ताद निकले। आप चाहें तो क्या नहीं कर सकते? 1962 का इतिहास भी दोहरा सकते हैं हुजूर!’’
उस्ताद घाट-घाट का पानी पीया हुआ था। वह जमूरों की नस-नस से वाकिफ था। उसको पता था कि यह किस नंबर का जमूरा है। इसके पूर्व भी उसके पास कितने जमूरे आए और चले गए।
कुछ गुलाम बने। कुछ आखंे दिखाने लगे, तो वह उनपर ऐसा आर्थिक जाल फेंका कि कसमसाने लगे। वह सभी जमूरों का भूत-भविष्य जानता था, तभी तो उस्ताद कहलाता था।
वह मौके की नजाकत को भांपा और मौकापरस्त तीर चलाया,‘‘टुम हमें अपने मुल्क में सैनिक अड्डा बना लेने दो। फिर देखना, दुश्मन की खाट खड़ी कैसे करते हैं हम?’’
फिर जापान की ओर हाथ उठाकर कहने लगा,‘‘वह मालाबार सैन्याभ्यास से इतरा रहा है। मैं भी उसको तिब्बती पठार में युद्धाभ्यास से डराकर रखा हूं। मगर, वह इतना ढीठ है कि अपने आका की शह पर डरता नहीं हैं। ऊपर से अपनी जनता पर राष्ट्रवाद का जहर भरकर हमारे व्यापार को चैपट करने पर आमादा है।’’
तभी जमूरा बोल पड़ा, ‘‘कश्मीर पर बातचीत करवाने के लिए मैं हिंदुस्तानी चम्मचों को लगा रखा हूं सर। परंतु, वहां की सरकार पीओके व आतंकवाद से नीचे बात करना नहीं चाहती।’’
‘‘अरे! तुमको नहीं पता कि हमने कोरोनावायरस से ऐसा तहलका मचाया है कि सब ता-ता, थैंया खेल रहे हैं। सबकी नस-नाड़ी ढीली कर रखी है हमने।’’ उस्ताद एंेठ कर बोला, तो जमूरा अचरज में पड़ गया; क्योंकि वह भी कोरोना के कहर से कराह रहा है।
उस्ताद हंसता हुआ बोला,‘‘मैंने गलवान में नूरे पहलवान को चारों खाने चित्त करने का प्लान बनाया था, किंतु अंकल सैम ने ऐसी भांजी मार दी कि हमारा बना-बनाया खेल बिगड़ गया।’’
उस्ताद व जमूरे में इतनी ही बात हो पाई थी कि जमूरे के विरोधियों ने उसके सत्ता सिंहासन पर कब्जे का ऐलान कर दिया। यह सुन जमूरे के होश फाख्ता हो गए। उसको बेहोशी के दौरे पड़ने लगे।
वह ‘उस्ताद-उस्ताद’ करता हुआ अर्श से फर्श पर जा गिऱा। दुनिया उसकी औकात देखती रह गई। उस्ताद बंगलें झांकने लगा।
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विशेष टीपःः वीरेंद्र देवांगन की ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome से जाकर amazon.com/virendra Dewangan में देखा जा सकता है।

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