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व्यंग्य-कथाःः पापी देवता के दरबार में-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथाःः
पापी देवता के दरबार मेंःः
पड़ोसी ने मुझ से कहा,‘‘भाई साहब मुझे सरकार बनानी है. कुछ मदद करो।’’
मैंने कहा,‘‘मुझे खिचड़ी तक बनानी नहीं आती, सरकार क्या खाक बनाऊंगा? एक दफा सब्जी बनाया था, तो आवारा कुत्ते ने भी खाने से मना कर दिया, जिसकी मजा मेरी बिटिया आज तक लेती रहती है।’’
मेरी साफगोई सुनकर पड़ोसी उदास हो गया, बोला,‘‘कोई तो होगा, जो सरकार बनाता होगा। उसी से बनवा दो।’’
मैं सोच में पड़ गया। ऐसा काम कौन करता होगा? मैं अपना दिमागी घोड़ा दौड़ाने लगा। तभी ख्याल आया कि एक पार्टी का पहलवान टाइप अध्यक्ष यह काम बखूबी करता रहता है।
उसने अनेक राज्यों में आननफानन में सरकार बना डाली है। उसने एक बार एक बीमारू राज्य के महागठबंधन में सेंध मारा। सत्तारूढ़ पार्टी के दो फाड़ किया और नई सरकार बना डाला। सरकार चल भी गई। अभी, वहां आगामी चुनावी बिगुल बजने लगा हैं।
यही सरकार पहले उन्हें दुःशासन की लगती थी, अब सुशासन की लगती है. वक्त-वक्त की बात है। इतनी बात दिमाग में आते ही मैं खुशी से उछल पड़ा। बोला, ‘‘चलो.’’
‘‘लेकिन कहां?’’ पड़ोसी पूछा।
‘ ‘‘उनके पास, जो टिकाऊ सरकार बनाते हैं।’’ मैंने तपाक से उत्तर दिया.
पड़ोसी उतावला होता हुआ बोला,‘‘फिर भी कहां? बताओ तो सही!’’
‘‘उसी काबिल अध्यक्ष के पास, जो देशभर में मजबूत सरकार बना रहे हैं। तुम्हें उनसे अच्छा सरकार बनवैया कोई नहीं मिलेगा। ये काम वो पांच-छह साल से बखूबी कर रहे हैं’’ मैंने खुलासा किया।
‘‘यही तो गफलत है। मुझे दमदार सरकार नहीं; कमजोर, कायर, लंुजपुंज, ढीलाढाला, सुस्त, कोई निर्णय नहीं लेने वाला सरकार बनाना है। ऐसा नालायक सरकार कोई बनाता हो, तो बताओ?’’ पड़ोसी ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा।
मैं फिर सोच में पड़ गया। अब की चिंता बड़ी थी। क्योंकि ऐसी घटिया सरकार कौन बनाता होगा? यह सोचनीय विषय था। तभी इलेक्ट्रिक मीडिया से जानकारी मिल रही थी कि एक राज्य में चमत्कारी से बलात्कारी बना एक पाखंडी बाबा रहता है, जो अपने अपराध व पाप को दबाने के लिए ऐसी सरकारें बनाया करता है।
वह अपने पैतृक और पासपड़ोस के राज्यों में ऐसी ‘खटारा’ सरकार जानबूझकर बनाया है, जो राज्य में हिंसा, आगजनी, गोलीबारी, तोड़फोड़, मारकाट होने पर भी चुप्पी साध ले। लगता है, खटारा सरकार ‘नायक फिल्म’ के खलनायक को अपना आदर्श मानता है, जो हिंसा की चपेट में आने पर भी राज्य के पुलिस प्रमुख को कार्रवाई करने से रोक देता है और अपनी मजबूरी बताता रहता है।
पड़ोसी उछल पड़ा। खुशी से झूमते हुए बोला,‘‘वाह भाईसाहब! क्या कहने? आप के मुंह में घी-शक्कर! आपने तो मेरे मन की बात जान ली। मुझे ऐसी ही निकम्मी सरकार बनानी है, जो नाम की रहे; काम न करे। बिल्कुल गांधीजी के तीन बंदरों की तरह; जो बुरा न देखे; बुरा न सुने और किसी का बुरा न करे।’’
‘‘इतना ही नहीं, उस हीरोनुमा बाबा को सरकारें बनाने का दीर्धकालीन अनुभव भी है, जिसका लाभ तुम्हें बेकाम की सरकार बनाने के लिए मिल सकता है। एक टीवी चैनल में खुलासा हो रहा है कि इसके पूर्ववर्ती सरकारों को भी वही बनाया था।’’
होता यह है कि अपने रहस्यमयी गुफा में महिलाओं का शिकार करने के बाद, जिस पार्टी से उसे बाल बिका न होने का आशीर्वाद मिल जाता है; वह अपने आंख के अंधे चेलों को उसी पार्टी को जिताने का फरमान जारी कर देता है।
यही नहीं, वह स्टंट फिल्में भी बनाता है। मूर्ख भक्तों को झांसा देने के लिए सीडी भी बनाता है। बातों-बातों में उल्लू भी बनाता है और उसके जैसा कोई दरिंदा न बन जाये, इसलिए लोगों को नपुंसक भी बनाता रहता है।’’
फिर क्या था? हम दोनों पड़ोसी, उस बाबा के दरबार में सरकार बनाने का आशीर्वाद लेने के लिए जा पहुंचे। रास्ते में एक जानकार ने हमें यह बताकर भयभीत कर दिया कि संभल कर अंदर जाना और सोच-समझ कर बात करना; क्योंकि वह इंसान के वेश में शैतान है। वह खबरखोजियों का बैरी है। खबरचियों को ठिकाने लगाने का महान काम भी वह करता रहता है।
सचमुच, वहां का नजारा देखकर सहम गए हम। बाबा का डेरा, जो कभी गुंडे टाइप भक्तों, खौफजदा साध्वियों, अंधभक्त महिलाओं, मासूस बच्चों व बुजुर्गों से पटा रहता था, वहां सैनिकों का डेरा हो गया था।
सब दूर भय का वातावरण। हमें डरा-सहमा देखकर एक हथियारबंद फौजी कड़कदार आवाज में पूछा,‘‘कौन हो तुम? और यहां क्या कर रहे हो?’’
हमने अपने आने की वजह बताई, तो वह पहले खूब ठहाका लगाया, फिर बोला,‘‘राक स्टार से रेप स्टार बने बाबा का खेल खत्म हो गया है। वह 20 साल के लिए अंदर चला गया है। अब, तुम लोग भी पतली गली से खिसक लो, वरना तुम्हें भी बाबा का गुंडाफौज समझकर उसी तरह धर देंगे, जैसे अन्य गुंडे-बदमाशों को धरे-पकड़े है।
हम डरकर हड़बड़ी में उल्टे पांव भागे। भागने में मुझसे गड़बड़ी हो गई कि मैं बाबा के पत्थरबाजों के द्वारा फंेके गए पत्थर से जा टकराया और औंधे मुंह धरती पर गिरा। तभी मेरे मुंह से जोरों से आवाज निकल गई,‘‘ओय, तेरी तो!’’
दोपहर को सोते-सोते बिस्तर से बोले गए इन शब्दों से मेरी नींद खुल गई। मैं उठ बैठा। हक्का-बक्का सबको देखता रहा। मेरे बच्चे चिंता से पूछने लगे। आप ये ‘‘ओय तेरी तो!’’ किसको और किसके लिए बोल रहे थे, पापा?
मैं चारों ओर देखा, तो महसूसा कि यह दिवास्वप्न था, जो झटके से आया और एकाएक चला गया। फिर मैं अपनेआप को सामान्य करने के लिए गुसलखाने में जा घुसा।
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विशेष टीपःः वीरेंद्र देवांगन की ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome से जाकर amazon.com/virendra dewagan में देखा जा सकता है।

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