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व्यंग्य-कथाःः ताली और थाली-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथाःः
ताली और थालीःः
लाकडाउन के दौरान ताली व थाली को समान महत्व दे दिया गया, तो उनकी बांछें खिल उठीं। वे झूम उठे। नाचने-गाने लगे। गलबहियां करने लगे।
लेकिन, दुर्भाग्य से एक ‘माननीया’ ने ताली के स्थान पर थाली को तवज्जो देते हुए कह दिया कि ‘जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद नहीं करते’, तो थाली इतराकर ताली से बोली,‘‘रे ताली! तू तो अब बीते दिनों की बात हो गई है। किंतु, मुझे देख। मेरी पूछ-परख अब तक बनी हुई है। लोग मुझको भूले नहीं हैं।’’
‘‘तुझको भूलें तेरे दुश्मन! तू भूलने के लायक नहीं है दीदी।’’ ताली, थाली को बड़ी बहन मानने लगी थी और उसको आदर से दीदी कहा करती थी।
बोली,‘‘वे नासपिटे हैं, जो तुझको भोजन करने के लिए इस्तेमाल करते हैं और तुझमें छेद करने की बात करते हैं। इनमें वे लोग आगे हैं, जो अपने-आप को नेता कहते हैं और जनाकाक्षाआंे की थाली में छेद करते रहते हैं। इसके बाद वे व्यापारी हैं, जो जनता को मिलावट व नकली सामान थमाकर उनके सेहत की थाली में संेधमारी करते हैं।’’
‘‘सही कह रही है रे तू’’ थाली, ताली की बातों से सहमति जताते हुए बोली,‘‘जमाना ऐसा ही चला आ रहा है। जमाने की बदरंग हवा बालीवुड को भी लग गई है। देख न! हीरो की हत्या को हीरोइन आत्महत्या का रूप देने पर तुली हुई है और ड्रग्स की कहानी बीच में ले आई है। लेकिन, हाय री किस्मत! वही सपड़ा गई है और अब सबको सपड़ाने के लिए सबकी थाली में छेद कर रही है।’’
‘‘अरे वह क्या खाक करेगी, जिसकी छलनी में छप्पन छेद हों। वह तो खुद फंस गई है, इसलिए दूसरों को भी फंसाने का जुगत जमा रही है।’’ ताली, थाली की बात को आगे बढ़ाते हुए बोल रही थी।
तभी कई नशेड़ी, गंजेड़ी और भंगेड़ी आए और थालियों को उठाकर ले गए, ताकि उसमें छप्पन छेद कर सकें।
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