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व्यंग्य-कथाः:हे धृतराष्ट्र! तुमने फिर साबित किया-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथाः:
हे धृतराष्ट्र! तुमने फिर साबित किया::
हे धृतराष्ट्र! तुमने फिर साबित किया कि तुम पुत्रमोह में अंधे-के-अंधे ही रहे। युग बदला, किंतु तुम्हारा रवैया नहीं बदला। तुम्हारा पुत्रप्रेम कुपुत्र के प्रति वैसा ही रहा, जैसा महाभारतकाल में दुर्योधन के लिए रहा करता था।
जिस कुसंतान की बदौलत महाभारत युद्ध में तुमको सर्वनाश झेलना पड़ा; वही अब तुमको डुबो दिया है, लेकिन तुम्हारी आंख खुलने का नाम नहीं ले रहीं है राजन्।
तब तुम्हारा उसूल कदाचारी पुत्र को गद्दीनसीन करना था; अब गद्दी से चिपका कर रखना हो गया था। बाकी सब कुछ तुच्छ! देशभक्ति और जनसेवा दिखावा मात्र। तभी तो राजधर्म न निभाकर पित्रृधर्म निभाया तुमने।
मंत्री बने कुपुत्र पर आरोपों के बावजूद, उसका जवाब न देकर सरकार को ब्लैकमेल किया, नरेश।
हे राजन! महारानी गांधारी भी अजीब नारी निकली, जो स्वमेव आंखों में पट्टी बांधकर राजमाता के धर्म को भुलाकर फखत पत्नीधर्म निभाई। आखों में पट्टी बंाधने से उनमें इतनी नैतिकता शेष नहीं रही कि धर्म को धर्म कहे और अधर्म को अधर्म।
जरा सोचो; पांडवों की बड़ी मम्मी, यदि अधर्म को अधर्म कहती तथा अपने नालायक पुत्र को अधर्म करने से शक्ति से रोकती, तो वह कौरववंश के नाश का कारण नहीं बनती?
हे महाराज! तुमपर चारा घोटाले का गंभीर आरोप था। लेकिन, तुम सत्ता के मजे लूटना चाह रहे थे। अब जेल में पड़े-पड़े सड़ रहे हो। फिर भी ये हाल है तुम्हारा।
यही वजह है कि तुम्हारी सियासी लुटिया 2014 के आम चुनाव में डूब चुकी थी। लेकिन विधानसभा चुनाव में सुशासन कुमार का साथ मिल जाने से डूबती नैया पार लग गई थी।
हे सम्राट! तुम्हारे परिजनों के खिलाफ एक नहीं, अनेक संवैधानिक संस्थाएं जांच-पड़ताल कर रही हैं। सीबीआई, ईडी और आईटी; आय से अधिक संपत्ति, मनीलान्ड्रिंग, बेनामी संपत्ति, रेलवे टेंडर घोटाला, पेट्रोल पंप घोटाला, शेल कंपनी आदि के मामले में तह तक जा रही हैं।
इससे महागठबंधन के साथी खुश थे। तभी तो तुमको गलती स्वीकारने की सलाह देने के बजाय, अकड़ में रहने की राह दिखा रहे थें हुजूर।
हे डेढ़ ईंट की पार्टी के सुप्रीमो! तुमको राजनीति का मसखरा यूं नहीं कहा जाता। इसकी योग्यता तुममें कूट-कूटकर भरी हुई है। बीच-बीच में तुम इसका सबूत पेश करते रहते हो कि राजनीति के जोकरों के शहंशाह तुम्ही हो।
जब तुम्हारे महल में ईडी का छापा पड़ा, तब तुमने यह कहकर सबको हंसने पर मजबूर कर दिया,‘‘इसके लिए मैं नहीं, पंतप्रधान और उसका अध्यक्ष दोषी हैं।’’
लगता है पहले भी इसी तरह की जुमलेबाजी किया करते थे और गठबंधन के पंतप्रधान को ब्लेकमेल कर अपने पापकर्म को छिपाया और दबाया करते थे।
अपने केस को कमजोर करने का इससे अच्छा शिगुफा और क्या हो सकता है? इसी से कानूनी दांव-पेंच का लाभ उठाकर बचे रहते थे, बरखुरदार।
जब सूबे में बाढ़ आई, तब तुम्हारा बयान था, ‘‘डरने-घबराने की कौवनो जरूरत नाहीं है। गंगा मैइया आपमन के पैर पखारने आई है।’’
यही नहीं, जब तुम सूबे के सूबेदार थे, तब तुमने एक जोक उछाला था, जो खूब चर्चा में आया था,‘‘सूबे की राजधानी की सड़कें ऐसी, जैसी फलां… हिरोइन की गाल!’’
अतएव, कौरवों के हे बुड़बक पिता! अब भी सुधरो। भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में दुर्योधन व दुःशासन को लगाओ। परिवारवाद, वंशवाद व जातिवाद त्यागो। देश को घर-परिवार समझो। हस्तिनापुर को साफ-सुथरा कर फिर से राजपाट प्राप्त करो।
वरना हस्तिनापुर का कड़क कानून प्राणप्रिय दुर्योधन, दुश्शासन, जयद्रथ, शकुनि, शल्य तक को नहीं छोड़नेवाला है।
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विशेष टीपःः वीरेंद्र देवांगन की ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome से जाकर amazon.com/virendra dewangan में देखा जा सकता है।

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