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व्यंग्य-कथाःः मोहल्ले का दुकानदार-वीरेंद्र देवांगना

व्यंग्य-कथाःः
मोहल्ले का दुकानदारःः
कोई माने या न माने, मेरा मानना है कि मोहल्ले का दुकानदार मौके में एशियन बैंक से कम नहीं होता। महीने के अंत में, जब किसी ग्राहक की जेब ढीली होने लगती है, तब वही ऐसा फरिश्ता होता है, जो ग्राहकों की सहायता खुले दिल से करता है, फिर चाहे वह कितना ही ब्याज क्यों न एंेठ लेता हो?
बैंकें उधारी देने के बदले ब्याज लेती हैं, लेकिन विजय माल्या सरीखे महान हस्तियों को छोड़कर जब किसी को उधार देती हैं, तब लेनदार को नानी याद आ जाती है।
अव्वल तो वह गरीबों को उधार देती नहीं है, वह उन्हें दूर से इसलिए फुंफकार देती है, ताकि वह दोबारा बैंक की दहलीज चढ़ने से पहले फुंफकारने के दंश से सहमा-सहमा नजर जाए।
बैंकें किसी गरीब-गुरबे को कर्ज देती भी है, तो उससे इतना दस्तावेज मंगवाती है कि वह भयभीत होकर कर्ज नहीं लौटाने और दुबारा नहीं लेने का कसम खा लेता है और मोहल्ले के दुकानदार के शरणागत हो जाता है। यही कारण है कि साहूकार की साहूकारी और दुकानदार की दुकानदारी बेखटके चलती रहती।
सवाल यह भी कि क्या कोई मल्टी-माल या आनलाइन टाल सड़े-गले, धुन लगे और बिगड़े सामान को वापस ले सकता है। नहीं, कदापि नहीं! लेकिन पड़ोस के दुकानदारों में इतनी दयानतदारी होती है कि वह जब चाहे तब, सामान ऐसे वापस ले लेता है, जैसे एहसान जता रहा हो और उससे बड़ा धर्मालु कोई न हो।
वह सामानों की अदला-बदली भी कर लेता है। वह ऐसा चक्कर चलाता है कि खुद्दार के पुराने सामान में नया सामान मिलाकर पोद्दार को दे देता है। इससे ग्राहक खुश होकर कहता है-कितना व्यवहारकुशल दुकानदार है? हर बात में खुशी-खुशी तैयार रहता है।
कोरोनाकाल में जब बिग बाजार व शापिंग बाजार बंद थे, तब वहीं तारणहार था। किसी हितैषी की तरह वह सबको सामान ऐसे देता था, जैसे दानवीर कर्ण का नाती हो, जैसे सामान व ‘आलू बनाने की फैक्टरी’ घर पर लगा रखी हो।
इससे यही लगता था कि पड़ोस का दुकानदार वही शख्स है, जो एक युवा नेता के द्वारा ‘‘आलू बनाने की फैक्टरी’’ लगाने के ऐलान को साकार करने में जुटा हो।
दुकानदार लाकडाउन के दौरान बड़ा-चढ़ाकर रेट लगाता था और कई गुना कमाता था। लोग मरे-मरे लेते थे; क्योंकि बाहर पुलिस का सख्त पहरा हुआ करता था।
ऐसे दानवीर की वही शिकायत कर सकता था, जिसमें जरा-सा भी दयालुता शेष न हो। इसलिए, दयालु होने का दंभ भरने के लिए सब चुप रहा करते थे।
वह मोहल्ले का कर्ताधर्ता और सबका पालनकर्ता होता है। वह मोहल्ले के लोकतंत्र में अर्थतंत्र की गाड़ी चलाता है। वह न होता, तो दीगर लूटतंत्र हावी हो जाता? कोरोनाकाल में तो लोग टें ही बोल जाते। यही सोच-सोचकर मेरा दिल बैठा जा रहा है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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