ग़ज़ल-जीतेन्द्र कुमार गुप्ता

ग़ज़ल-जीतेन्द्र कुमार गुप्ता

आओ अंतर्मन में दीप जलाएं धरा से तम को दूर भगाएं । हुआ अयोध्या पूरा जगमग, वनवास बीता राम जब आएं। हो न लक्ष्य आंखों से ओझल संकल्पित हो कर क़दम बढ़ाए। त्योहार दिवाली खुशियों का है, कलुष भूलाकर गले लगाएं । स्वच्छ देश हो,स्वच्छ हो मानस स्वच्छता का ही अलख जगाएं। मानवता की हत्या
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गजल-किरन भण्डारी

सायबा सुनो जरा ना इस कदर हमें बेकरार किजिए नींदो को मेरी ना बेजार कीजिए मूरीद हूं मै ,करूं सजदा तुम्हारा खुदा इश्क का तुम्हें बना कर यारा इबादत करू तो स्वीकार किजिए… ना हो मुकम्मल जो हों रूबरू ख्वाबों मे ही आकर तो प्यार किजिए…. हूजूर ना इस कदर बेकरार कीजिए……      
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गजल-मधु त्रिवेदी

ये उमर की ढलान है शायद इसलिए तो थकान है शायद यह जहाँ हो गया उसी का ही प्रेम पगती जबान है शायद हो गये बांट बटबारे हाथ तीरे कमान है शायद अब तलक प्यार तू मुझे करता यार यह बस लगान है शायद जाम ऐसा पिला दिया तूने इसलिए देह जान है शायद जो
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गजल-मधु त्रिवेदी

इस धरा पर जिन्दगी मेहमान है बस मिले इज्जत यही अरमान है हर किसी को ही मिले अधिकार सब क्योंकि हर कोई बना कप्तान है मान दोगे जब किसी को आप तो आपको मिलता रहे सम्मान है अब न लोगों में बचा है धैर्य जब बस लगे सबको वही अपमान है जब जमीं पर शेष
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गजल- धर्मेन्द्र उनियाल

वस्ल की खुबसुरत छत ऐ दीवार मे हिज्र का कोई तो दरवाजा रखें इश्क मे दिन रात बहते अश्को का कब तक खुद से तकाजा रखें वो जो इबादती बन कर कर रहा है आजकल परस्तिश तुम्हारी एक रोज बदल भी सकता है दिल ही दिल मे ये अंदाजा रखे तब्बसुम की दौलत को हिफाजत
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ग़ज़ल-अली मोहममद अली

कौन ये मूझमे सरे शाम नूज़ुल होता है । हंसते हंसते जिसे हर दर्द क़बूल होता है । तुम हारी नज़रो का तूम जानो’ निगाहो मे मेरी ख़ार होता है ख़ार’ फूल तो फूल होता है किसी के हक़ मे हो’ या हो किसी के ईखतिलाफ फैसला वकत का सब को क़ुबूल होता है पास
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गज़ल-अली मोहममद शेख

नज़र मे अपनी सभी है ! सही ‘ बराबर कही पे फिर है कमी कियु कही बराबर मेरा यकिन है! फिर न मरेगा पयासा कोई समझ ले खुद को समंदर ‘ नदी बराबर अकेला कौन कहाँ तक लड़े तलातुम से? खड़ा हो साथ मेरे भी कोई बराबर वो आज होंटो पे मेरी गज़ल सजाते है
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गजल-सुषमा मलिक

मैंने उन्हें सर झुकाकर मेरा सलाम बता दिया हाल-ए-दिल उनको अपना तमाम बता दिया किसीने मुझसे पूछा, उसके होठ कैसे है मैंने मुस्कुराकर मय-ए-जाम बता दिया किसीने मुझसे पूछा, उसके गाल कैसे है मैंने हँसकर बस सुर्ख-ए-गुलाल बता दिया किसीने मुझसे पूछा कैसा दिखता है वो मैंने सच में शहजादा-ए-जहां बता दिया किसीने मुझसे पूछा,
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मौला-प्रांशुल शर्मा

दिल का दिल से नाता टूट गया , धड़कन भी हमसे रूठ गई , जिंदगी की कुछ सांसे थी ये भी हमसे मुहं मोड़ गई बेवजह , वेवक्त , बेपनाह मोहब्बत थी तुमसे आज मेरे खून के एक एक कतरे से बह रही , मौला आज मेरे जिस्म से रूह निकल रही मौला मेरे आज
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गज़ल- जितेंद्र शिवहरे

महबूब मेरे मुझे बस दूर से देखते है दिल जलता है यहां वो वहां आंखे सेकते है। तारिफ में कितने कशीदें पढ़े है मैंने तुम्हारी आप आज भी बस यहां वहां की फेंकते है। मोहब्बत की भी अज़ब रस्म है यां रब दम गुर्दें वाले भी यहां घुटने टेकते है। इजहार किया उल्फत का दुनिया
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