गज़ल-अली मोहममद शेख

गज़ल-अली मोहममद शेख

नज़र मे अपनी सभी है ! सही ‘ बराबर कही पे फिर है कमी कियु कही बराबर मेरा यकिन है! फिर न मरेगा पयासा कोई समझ ले खुद को समंदर ‘ नदी बराबर अकेला कौन कहाँ तक लड़े तलातुम से? खड़ा हो साथ मेरे भी कोई बराबर वो आज होंटो पे मेरी गज़ल सजाते है
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गजल-सुषमा मलिक

मैंने उन्हें सर झुकाकर मेरा सलाम बता दिया हाल-ए-दिल उनको अपना तमाम बता दिया किसीने मुझसे पूछा, उसके होठ कैसे है मैंने मुस्कुराकर मय-ए-जाम बता दिया किसीने मुझसे पूछा, उसके गाल कैसे है मैंने हँसकर बस सुर्ख-ए-गुलाल बता दिया किसीने मुझसे पूछा कैसा दिखता है वो मैंने सच में शहजादा-ए-जहां बता दिया किसीने मुझसे पूछा,
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मौला-प्रांशुल शर्मा

दिल का दिल से नाता टूट गया , धड़कन भी हमसे रूठ गई , जिंदगी की कुछ सांसे थी ये भी हमसे मुहं मोड़ गई बेवजह , वेवक्त , बेपनाह मोहब्बत थी तुमसे आज मेरे खून के एक एक कतरे से बह रही , मौला आज मेरे जिस्म से रूह निकल रही मौला मेरे आज
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गज़ल- जितेंद्र शिवहरे

महबूब मेरे मुझे बस दूर से देखते है दिल जलता है यहां वो वहां आंखे सेकते है। तारिफ में कितने कशीदें पढ़े है मैंने तुम्हारी आप आज भी बस यहां वहां की फेंकते है। मोहब्बत की भी अज़ब रस्म है यां रब दम गुर्दें वाले भी यहां घुटने टेकते है। इजहार किया उल्फत का दुनिया
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गज़ल-जितेंद्र शिवहरे

मुश्किलों में जब से मैं गिरफ्तार हो गया कहते है लोग मैं भी जिम्मेदार हो गया। घोसलें की चाह में भटकता रहा मैं दिनभर एक शाम घर का सपना साकार हो गया । छेड़ती है कुछ लड़कीयां नाज से मुझे बहुत जानती है सहेली से उनकी मुझे प्यार हो गया। तंग नहीं करते मेरे जानी
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गज़ल- जितेंद्र शिवहरे

क्या खूब दिलबर दुश्मनी को अंजाम देते है हुस़्न का तेवर दिखा आंखों से जाम देते है। होठों पे आ पाये जो अल्फाज मुश़्किल है आंखों के इशारों से वो काम लेते है। इश़्क प्यार मोहब्बत जमाने का शौक है लेकिन सुना है इसका भी वो दाम लेते है। भूल जाऊं उनको जरा सी बात
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यह परमार्थ- मुकेश नेगी

करदे मुकम्मल ऐ नबी खुद से जुदा करना नही मेरे सिर के ऊपर हाथ रख कहदे कि अब ङरना नही। मै आऊँगा तू सब्र कर इब्रत मेरी सुन गौर से आलम के आतिश मे मगर आदाब बद धरना नही । रहना अव्वल असरार मे जिसका निशां सबसे बङा़ पाक कर इस रोम को साहिब मिले
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वक्त-चेतन वर्मा

ए यादों का मंजर खत्म क्यों नहीं होता सावन का एहसास है या दो दिलों की प्यास है कुछ तो खास है वरना यूं समेटकर सूखे पत्तों को जलाने का वक्त किसके पास है… खो गई हो अगर कहीं पर तो भी लौट आना यहां निगाहें कहीं और निशाने कहीं और होते हैं आसमान भी
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गजल – ओमकांति

पेशी है आज मेरी तेरे दिल की अदालत मे। देखते है क्या सजा मिलती है इस बदनाम को।आंखे वकील बनके सारी बात बता गई, पलके भी तो यार कोई सबूत लाई है, आंशू गवाही देंगे सहमे हुए जज्बात के ।देखते है —-।इतने पे यकीन न हो तो हांथो को जरा देखलो, अभी तक निशान है
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औरत – शाम सुंदर सैनी

बयां नहीं कर सकती इसमें वैसे तो बहुत जोश है औरत और कलम आज ना जाने क्यों खामोश है कमजोर समझते हैं जो औरत जात को यह तो सीधा सीधा मानसिकता का ही दोष है औरत और कलम.. गाथा इनकी लिखूँ, जो चंद पन्नों पर नादान हूं मैं, अभी कहां इतना होश है.. औरत और
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