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फितरत-पदम सेन

फितरत

दुसरों में कमीयां ढुंढे खुद की कमीयां छुपाते
घर में तो मोर नाचा बाहर चिड़िया उड़ाते
कैसी है ये इन्सानी फितरत दुसरो पे उंगली उठाते
पर खुद की तो फितरत छुपाते

कहीं पर जब महफ़िल जमाते तो आपस में ये बतियाते
इसने ऐसा किया है उसने वैसा किया है
उसकी नियत खराब है वो तो पीता शराब है
लेकिन जब खुद की बात आती तो सिर के तोते उड़ जाते कैसी है ये इन्सानी फितरत दुसरो पे उंगली उठाते पर खुद की फितरत छुपाते

दिन-रात झूठ बोलते खुद को सच्चा बताते
भगवान की कसमें खाते अल्लाह के देते नाते
सच के तवे पे झूठ की रोटी पकाते
कैसी है ये इन्सानी फितरत दुसरों पे उंगली उठाते
पर खुद की फितरत छुपाते

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