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ग़ज़ल – ए – गुमनाम-डॉ.सच्चितानन्द चौधरी

                  ग़ज़ल-8 

ईर्ष्या जब कभी हृदय में घर कर जाती है
जहन में सिर्फ़ खंज़र-खंज़र कर जाती है

कात़िल तो कत़्ले-गुनाह करता है बहुत बाद
उसकी सोच बहुत पहले अंदर कर जाती है

दशायें खींचती रहीं हरदम मुझे अपनी ओर
मेरी ख़ुद्दारी ही मुझे दर-ब-दर कर जाती है

मज़हब हमारे लिए या मज़हब के लिए हम
यही भ्रम हमको अलग अक़्सर कर जाती है

‘वो’ दिखती नहीं मगर उसका अहसास ‘शशि’
‘वो’ है, इसको वो साबित बराबर कर जाती है

                        डाo सच्चितानन्द 'शशि' 
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Dr.sachitanand-Chaudhary

Dr.sachitanand-Chaudhary

Medical Practioner .Writing poetries and gazals from class ninth.

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