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ग़ज़ल-अमित-रजक

ये ड्रग्स ये नशा और बबाल बाकी है
कशमकश है मुद्दे में उछाल बाकी है

वो कबका हमसे दूर गुज़र कर गया है
किसका ज़-रिया और मलाल बाकी है

निरुत्तर से प्रश्नोत्तर फिर निरुत्तर हम है
जबाव कठघरे में है सवाल बाकी है

सत्ता की हथेली पर न रेत है न पानी है
जनता अंधभक्त है बस क-माल बाकी है

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