गज़ल- जितेंद्र शिवहरे

गज़ल- जितेंद्र शिवहरे

महबूब मेरे मुझे बस दूर से देखते है
दिल जलता है यहां वो वहां आंखे सेकते है।

तारिफ में कितने कशीदें पढ़े है मैंने तुम्हारी
आप आज भी बस यहां वहां की फेंकते है।

मोहब्बत की भी अज़ब रस्म है यां रब
दम गुर्दें वाले भी यहां घुटने टेकते है।

इजहार किया उल्फत का दुनिया के आगे मैंने
आप तन्हाई में भी मोहब्बत करने से झेपते है।

इश़्क में बना तो दिया मुमताज महल ‘जितेंद्र’
तुम क्या बना पाते हो अब ये देखते है ?

गज़ल से मेरी जलन रखे तो रखीए साहब
हम इधर का श़ेर उधर नहीं टेपते है ।

 

         जितेंद्र शिवहरे

       चोरल ,महू, इन्दौर

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