गज़ल- जितेंद्र शिवहरे

गज़ल- जितेंद्र शिवहरे

क्या खूब दिलबर दुश्मनी को अंजाम देते है
हुस़्न का तेवर दिखा आंखों से जाम देते है।

होठों पे आ पाये जो अल्फाज मुश़्किल है
आंखों के इशारों से वो काम लेते है।

इश़्क प्यार मोहब्बत जमाने का शौक है
लेकिन सुना है इसका भी वो दाम लेते है।

भूल जाऊं उनको जरा सी बात मगर•••
लबों पे कभी-कभी मेरा भी नाम लेते है।

भूल मुझे वो जाये ये आसार नहीं दिखते
नाश्ते में सुबह शाम वो बादाम लेते है।

हुकूमत परेशां उनसे है काबू में कैसे हो
चाहने वालो के नाम सरे आम लेते है।

जंग मची जितेंद्र ताजों की तख्त़ों की यहां
सल्तनत हिल जायें आहों से जब कोहराम लेते है।

(9)
[26/07 6:31 pm] जितेंद्र शिवहरे:

गज़ल

मुश्किलों में जब से मैं गिरफ्तार हो गया
कहते है लोग मैं भी जिम्मेदार हो गया।

घोसलें की चाह में भटकता रहा मैं दिनभर
एक शाम घर का सपना साकार हो गया ।

छेड़ती है कुछ लड़कीयां नाज से मुझे बहुत
जानती है सहेली से उनकी मुझे प्यार हो गया।

तंग नहीं करते मेरे जानी दुश्मन मुझे अब से
जान गये मैं निकाहे खुदकुशी को तैयार हो गया।

मज़ाक खूब बनातें है दुनिया वाले मेरा कुछ युं
लोगों की परख में जबसे मैं होशियार हो गया।

फुर्सत में है वो जेलर साहब आजकल इलाके में
खूंखार वो कैदी जब से बिन बोले फरार हो गया।

रोता रहता है वो बच्चा किसी का सुबह-शाम
इल्म है उसे झाड़ियों में मिला वो बेकार हो गया।

भागते है छोरा-छोरी घर से इश़्क की जंग जितने
मोहब्बत करना भी अब तो व्यापार हो गया।

बुजुर्गों की इज्ज़त नौजवान अब करने लगे है
सेल्फी का क्रेज जब से रस़्मों में शुमार हो गया।

मोहलत मिले मुझे भी जाग़ीर नीलामी की अपनी
जम़ीर किश़्तों में बेचना नशा-ए-खुमार हो गया।

शेरो-शायरी की महफिल भी क्या रंग जमाने लगी है
मुशायरे में आना अब कितना मज़ेदार हो गया है।

शोहरत कदम चूमने लगी जब से जितेंद्र अपनी
कुत्तों से ज्यादा इसान वफादार हो गया।

 

  जितेंद्र शिवहरे

चोरल, महू, इन्दौर

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