गज़ल – सौरभ राज सोनी

गज़ल – सौरभ राज सोनी

मैं अपने दर्द की खुद एक दवा हो जाऊं ;
नसीब बनके लकीरों में रवां हो जाऊं।

साहित्य लाइव रंगमंच 2018 :: राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी प्रतियोगिता • पहला पुरस्कार: 5100 रुपए राशि • दूसरा पुरस्कार: 2100 रुपए राशि • तीसरा पुरस्कार: 1100 रुपए राशि & अगले सात प्रतिभागियों को 501/- रुपये प्रति व्यक्ति

मेरे वजूद से वो ज़िन्दगी मुस्कुराने लगे ;
उसे खुश्बू की तरह छू कर हवा हो जाऊं ।

कोई शामिल है ज़िन्दगी में हमक़दम बनकर ;
मैं कैसे उसका दुश्मन -ए- जां हो जाऊं।

उसकी सीरत ने उसकी सूरत को पीछे छोड़ दिया ;
अब ये मुमकिन है मैं उसपे फ़ना हो जाऊं।

कोई दिखता नही अब बन्दिगी करते मुझको ;
हर शख़्स ये चाहता है मैं ख़ुदा हो जाऊं ।

एक बेटे को माँ से मिलते देखा तो महसूस किया ;
सूख जाऊंगा अगर मिट्टी से जुदा हो जाऊं।

बस एक दिल में उम्र भर की कैद मांगी है;
फिर इसके बाद चाहे दुनिया से रिहा हो जाऊं।

जीत ले जाये अगर वो तो उसकी अमानत हूँ;
मैं कोई क़र्ज़ नही हूँ जो अदा हो जाऊं।

हर किसी को खुश रखना भी मुनासिब नही हैं “सौरभ” ;
राख हो जायेगा सबकुछ अगर मैं धुंआ हो जाऊं।

Sourabh Raj Soniसौरभ राज सोनी
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

गज़ल – सौरभ राज सोनी
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