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ग़ज़ल – ए – गुमनाम-डॉ.सचितानंद -चौधरी

                      ग़ज़ल-7 

नाचती धरती और झूमता हुआ गगन हो
बीच में सारी दुनिया बस एक चमन हो

धागा से प्यार का पानी बन जायें हम
बहकर बहाने का हम में पागलपन हो

फ़िर जज़्बात मर ही नहीं सकती किसी की
दिल,जहन और आँखों में अगर संतुलन हो

मौत कुछ ऐसा कर कि हम एक साथ मरें
जनाज़ों पर हमारे सिर्फ एक कफ़न हो

अलग-अलग ख़ुशबुएँ तेरे अंग-अंग की
जैसे कई कस्तूरियों वाली तुम हिरन हो

मोक्ष को मिलें जब दो व्याकुल धड़कनें
‘शशि’ हमारा भी उसमें एक धड़कन हो

      लेखक- डाo सच्चितानन्द 'शशि'
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Dr.sachitanand-Chaudhary

Dr.sachitanand-Chaudhary

Medical Practioner .Writing poetries and gazals from class ninth.

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