Notification

अपने लेख प्रकाशित करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

कफ़्फ़ारा-भंडारी-लोकेश

थी नफरत मोहब्बत से
फिर भी ये गुनाह हुआ हमसे
ज़ब दर्द मिला तो टूट गए
कफ़्फ़ारा नहीं हुआ हमसे
क्या झूठ था तेरी बातों में
बस ये जान नहीं पाए
और रिमझिम गिरती नजरों का
सच पहचान नहीं पाए
चाहत थी तुम्हें भुलाने की
लेकिन ये कहां हुआ हमसे
ज़ब दर्द मिला तो टूट गए
कफ़्फ़ारा नहीं हुआ हमसे
क्या ख़ता हुई जो जुदा हुए
बस इतनी बात बता जाते
हम भी शायद उन राहों से
अपनी दुनिया में आ जाते
छोड़ा था तुमने वहीं हमें
हुआ हमको प्यार जहां तुमसे
ज़ब दर्द मिला तो टूट गए
कफ़्फ़ारा नहीं हुआ हमसे
(कफ़्फ़ारा – प्रायश्चित्त)
… भंडारी लोकेश ✍️

53 views

Share on

Share on whatsapp
WhatsApp
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on email
Email
Share on print
Print
Share on skype
Skype
bhandari-lokesh

bhandari-lokesh

b.sc mathematics (rajasthan university) b.ed (maths+chemistry) m.sc mathematics (ms brij university)

Leave a Reply

जागो और अपने आप को पहचानो-प्रिंस स्प्तिवारी

मैंने सुना है कि एक आदमी ने एक बहुत सुंदर बगीचा लगाया। लेकिन एक अड़चन शुरू हो गई। कोई रात में आकर बगीचे के वृक्ष

Read More »

Join Us on WhatsApp