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कफ़्फ़ारा-भंडारी-लोकेश

थी नफरत मोहब्बत से
फिर भी ये गुनाह हुआ हमसे
ज़ब दर्द मिला तो टूट गए
कफ़्फ़ारा नहीं हुआ हमसे
क्या झूठ था तेरी बातों में
बस ये जान नहीं पाए
और रिमझिम गिरती नजरों का
सच पहचान नहीं पाए
चाहत थी तुम्हें भुलाने की
लेकिन ये कहां हुआ हमसे
ज़ब दर्द मिला तो टूट गए
कफ़्फ़ारा नहीं हुआ हमसे
क्या ख़ता हुई जो जुदा हुए
बस इतनी बात बता जाते
हम भी शायद उन राहों से
अपनी दुनिया में आ जाते
छोड़ा था तुमने वहीं हमें
हुआ हमको प्यार जहां तुमसे
ज़ब दर्द मिला तो टूट गए
कफ़्फ़ारा नहीं हुआ हमसे
(कफ़्फ़ारा – प्रायश्चित्त)
… भंडारी लोकेश ✍️

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