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नज़्म-नरेंद्र-नायक

ये जुर्म केसा है मेरा जिसकी सजा मोहब्बत मुकर्रर हुई है!
तेरी एक मुस्कान पर पुरी कायनात दिवानी हुई है!

जुर्म कि सजा यही है तो ये जुर्म मैं बार-बार करता हूं!
तेरे चाहने वालो कि हुजूम मे एक चेहरा मैं भी रखता हूं!!

उलफ़त-ए-हुजूम मे मुझे भूल ना जाना!
मुखड़ा-ए-शराफ़त देखकर मेरी सजा माफ़ ना करना!!

मुझे तेरी मोहब्बत-ए-जिंदां मे ही रहना अच्छा लगता है!
अपनी दरियादिली के चलते हमे कैदखाने से आजाद ना करना!!

मोहब्बत-ए-पंछी कि दुनिया पिंजरा ही होता है!
इसका दागा पंछी खुले आसमान की उड़ाने भूल जाता है!!

जीते जी ऐसा कोई पल ना हो जिसमे महबूब मेरे संग ना हो!
जबतलक मौत दरवाजा ना खटखटाये खुदा करे हम जुदा ना होते! !

तेरी एक मुस्कान पर ताज़महल तुझ पर कुर्बान है!
शर्मा के गर देखे तो कोहिनूर तेरे नाम है!
और तुझे अपने दिवाने से कितनी मोहब्बत चाहिए!
रखदे तलवार गर्दन पर ये ज़िंदगी तेरे नाम है!!

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