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साखी-नरेंद्र-नायक

साखी हमसे पूछती है, दिल-ए-हाल बता दे ज़रा!
मैं उससे यही कहता हूँ, एक जाम एक जाम और पिला दे ज़रा!!

महखाना घर हो गया, घर का कुछ पता नही है!
यही सारी दुनिया आकर सिमट गई, और हमे कुछ पता नही है!!

हम जिंदा है साखी तो आ जाते है!
तेरी महकशी मे बीते दिन भूल जाते है!!

सिगरेट, शराब मे धुआ होती जिंदगी अच्छी लग रही है!
गिलास, गिलास मे डूबा मैं, ऐ मोहब्बत देख तुझसे इश़्क करने कि सजा मिल रही है!!

तुझे भुलाकर महखाने से मोहब्बत कर ली है!
इस चारदीवारी मे दुनिया कि हर तालीम हासिल कर ली है!!

तेरी दुनिया से तो महखाना अच्छा है!
यहां दर्द बांटने को कोई ना कोई तो मिल ही जाता है!!

अस्ल दुनिया तो महखाने मे है, जमाने मे क्या रखा है!
मोहब्बत का कत्ल होता हो जहा, वो सारा फसाना श्मशान हो चुका है, ऐसी दुनिया मे क्या रखा है!!

यहा तो साखी भी मेरा दर्द बड़ी तहजीब से सुनती है!
और आंखे भी छलकाती है, हमारी अधूरी मोहब्बत पर वो भी अश़्क बहाती है!
उसकी छलकती आंखो से मैं जाम भर लेता हूँ!
ज़ी करे अगर रोने का तो ज़ी भर के रो लेता हूँ!!

उसके बाद ऐ साखी तूने बड़ा सम्भाल कर रखा है मुझको!
ऐ साखी मुझे इतना पिला – इतना पिला कि मैं भूल जाऊं उसको!!

आ साखी बैठ मैं तुझे आज दिल-ए-हाल बता दूं ज़रा!
पर उससे पहले एक जाम एक जाम और पिला दे ज़रा!!

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