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समर्पण-बलराम सिंह


तुम्ही मेरी दर्पण हो,तुम्ही मेरी अर्पण हो
तुम्ही मेरी जीवन की,सुगम समर्पण हो।

तुम्ही मेरी कल्पना हो,तुम्ही मेरी साधना हो
तुम्ही मेरी जीवन की,सुगम आराधना हो।

तुम्हे हकीकत में तो नहीं,सिर्फ ख्वाबों में देखा है।
तुम्हे करीब से तो नहीं,सिर्फ दिल के एहसासों में देखा है।

तेरे सपनों के हकीकत,सजके रखा हूं मैं
तेरे दिल को संभाले,रखा हूं मैं
तू एक बार आके तो देख,तेरे राहो पर दीपक जलाएं रखा हूं मैं।

तेरे विना हर डगर,सुना सुना सा लगता है
तेरे विना हर रिश्ता,अधूरा अधूरा सा लगता है।
तूही मेरे दिल के करीब हो,तूही मेरी नसीब हो।

तुम्ही मेरी दर्पण हो,तुम्ही मेरी अर्पण हो
तुम्ही मेरी जीवन की,सुगम समर्पण हो।

बलराम सिंह की अपनी कलम से

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