वक्त-चेतन वर्मा

वक्त-चेतन वर्मा

ए यादों का मंजर खत्म
क्यों नहीं होता
सावन का एहसास है
या दो दिलों की प्यास है
कुछ तो खास है
वरना यूं समेटकर सूखे पत्तों को
जलाने का वक्त किसके पास है…

खो गई हो अगर कहीं पर
तो भी लौट आना
यहां निगाहें कहीं और
निशाने कहीं और होते हैं
आसमान भी अधूरा-सा
शोर मचाता रहता है
वरना यूं धरती को तड़पा तड़पाकर
बरसने का वक्त किसके पास है..

 

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               चेतन वर्मा 
            बूंदी,राजस्थान

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