यह परमार्थ- मुकेश नेगी

यह परमार्थ- मुकेश नेगी

करदे मुकम्मल ऐ नबी खुद से जुदा करना नही
मेरे सिर के ऊपर हाथ रख कहदे कि अब ङरना नही।

मै आऊँगा तू सब्र कर इब्रत मेरी सुन गौर से
आलम के आतिश मे मगर आदाब बद धरना नही ।
रहना अव्वल असरार मे जिसका निशां सबसे बङा़ पाक
कर इस रोम को साहिब मिले वरना नही ।

नाउम्मीदे कुछ नही उसकी नवाजिश जो मिले
वह फलक देखे बिना जहान से मरना नही ।

 

 

  मुकेश नेगी  

रायवाला, देहरादून   

0

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account