Notification

अपने लेख प्रकाशित करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

ग़ज़ल – ए – गुमनाम

पंख अरमानों में लगा रहा है कोई
आज फ़िर नई ग़ज़ल गा रहा है कोई

लौट आती है मुझमें प्रति-ध्वनि मेरी
लगता है मुझे ही बुला रहा है कोई

इससे पहले कि हर तरफ़ धुआँ हो जाये
उसे रोको, मेरा ख़त जला रहा है कोई

लगता है अब मैं ख़ुद से बिछड़ जाऊँगा
रफ्तः रफ्तः मेरी तरफ़ आ रहा है कोई

देखना है ‘शशि’ अब इस नशे की शिद्दत
हसरतों पी लो कुछ पिला रहा है कोई

53 views

Share on

Share on whatsapp
WhatsApp
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on email
Email
Share on print
Print
Share on skype
Skype
Dr.sachitanand-Chaudhary

Dr.sachitanand-Chaudhary

Medical Practioner .Writing poetries and gazals from class ninth.

Leave a Reply

ग़ज़ल – ए – गुमनाम-डॉ.सचितानंद-चौधरी

ग़ज़ल-21 मेरी ग़ज़लों की साज़ हो , नाज़ हो तुम मेरी साँस हो तुम , मेरी आवाज़ हो तुम मेरे वक़्त के आइने में ज़रा

Read More »

बड़ो का आशीर्वाद बना रहे-मानस-शर्मा

मैंने अपने बड़े लोगो का सम्मान करते हुए, हमेशा आशीर्वाद के लिए अपना सिर झुकाया है। इस लिए मुझे लोगो की शक्ल तो धुँधली ही

Read More »

Join Us on WhatsApp