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आत्मसंगीत की धारा-साथी-टी

हवा के झोंके की आवाज सुनाई
वाद्यवृंद की मेलध्वनि आसमान में उड़ रही हैं
सोने की कलभकांति भी आती रही हैं
मृगनयनी की तरह आंखों में एक ताज़ा अनुभव देती हैं
मयूर नृत्य की प्रस्तुति दी जाती रही हैं
वनस्पतियों का हर एक शाखाओं में वल्लरियां लिपट गई है
मेघचुंबी वल्लरियां पेड़ों पर लिपटी हुई निमंत्रण देती रही है
कोयल भी अपने आनंद की अनुभूति को छिपा नहीं जाती है
कंदर्प की अनुमति दी गई है तो क्या होगा कि प्राण तक छूने वाली
कोकिलनाद में अनुराग सुन्दर गीत भी सुनने से स्वर्ग तक पहुंच गई!

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