Notification

अपने लेख प्रकाशित करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

एक बादशाह की कहानी-हनफ़ी चैनल

‘शेख़ अबुल फ़जल ने फ़िरदौस मकानी बाबर बादशाह के बारे में लिखा- ‘…उनमें दुनिया पर हुकूमत करने के आठों उसूल मुकम्मल तौर पर मौजूद थे. पहला, बुलंद तक़दीर. दूसरा, ऊंची हिम्मत. तीसरा, दुनिया जीतने की ताक़त. चौथा, मुल्क संभालने की क़ाबिलियत. पांचवां, शहरों को बेहतर करने की कोशिश. छठा, दिल में रिआया की भलाई. सातवां, सिपाहियों को ख़ुश रखने की सलाहियत और आठवां, फ़ौज को तबाही फैलाने से रोकने की ताक़त.’

फ़िरदौस मकानी बाबर बादशाह अपनी वसीयत में अपने बेटे मिर्जा हुमायूं को ये ताकीद कर गए – ‘बेटा! हिंदुस्तान की सरज़मीं में हर मज़हब को मानने वाले लोग रहते हैं. अलहम्दोलिल्लाह इस मुल्क की बादशाहत तुम्हें सौंपी गई है. अपने दिल से भेदभाव दूर करके इंसाफ़ करो. ख़ास तौर पर तुम गाय की क़ुर्बानी ना करो. इससे तुम हिंदुस्तान के लोगों का दिल जीत लोगे और लोग बादशाह से जुड़ेंगे. सल्तनत में रहने वालों की इबादतगाहों को गिराओ मत. इतना बराबरी का इंसाफ़ करो कि लोग अपने बादशाह से खु़श हों और बादशाह लोगों से. इस्लाम ज़ुल्म की तलवार से नहीं, नरमी से आगे बढ़ेगा. शिया-सुन्नी की तरफ़ से आंख मूंद लो वरना इस्लाम कमज़ोर होगा. सल्तनत के अलग-अलग फ़िरक़े जिस्म के चार तत्वों की तरह हैं. सल्तनत की सेहत इनके तालमेल पर टिकी है
सत्ता पर काबिज लोगों ने हर दौर में अपने विरोधियों को निर्ममता से कुचला है. वर्तमान से अतीत तक कोई भी दौर इस इलजाम से मुक्त नहीं है, फिर वह क्या चीज थी जिसने हिंदुस्तान की बड़ी आबादी से बिल्कुल अलहदा रहन-सहन, संस्कृति और इबादत के तौर-तरीके वाले अकबर को, यहां के लोगों के दिलों पर राज करने वाला बादशाह बना दिया? शाज़ी ज़मा ने अपने इस उपन्यास में बेहद खूबसूरती से मुगल सम्राट अकबर के बनने और उनकी रूहानी और सियासी जिंदगी का खाका खींचा है. जो इस सवाल का जवाब भी है.
यह उपन्यास जितना शोध और खोजबीन करके लिखा गया है, उसके बाद इसे एक ऐतिहासिक दस्तावेज कहना कुछ गलत नहीं होगा. शाज़ी ज़मां ने एक तरह से बादशाह अकबर का वृत्तचित्र ही बना दिया है. अकबर की जिंदगी का ऐसा कोई पहलू नहीं होगा जिसकी खबर यहां पाठकों को नहीं मिलेगी.

अकबर के जन्म के समय की कुंडलियों का बहुत विस्तृत वर्णन पढ़कर लगता है कि जैसे लेखक शाज़ी ज़मा खुद भी ज्योतिष विद्या के अच्छे ज्ञाता हैं, या फिर इस उपन्यास पर काम करने के दौरान इस विद्या में माहिर हो गए हैं. एक जगह वे लिखते हैं, ‘इस कुलीन जन्मपत्री में दो ग्रहों का एक ही राशि में मौजूद होना, एक वरदान की तरह है. सूर्य की तीसरे भाव में मौजूदगी ऐसे जातक को शांति और संप्रभुता की ऊंचाइयों तक ले जाती है. जब चंद्र के साथ बुध, बृहस्पति तथा शुक्र का किसी भी तरह से दृष्टि-संबंध बनता है तो यह इस बात का साफ़ संकेत है कि जातक कई राज्यों को अपने अधीन करते हुए हुकूमत करेगा.‘

कदम-कदम पर शक, रंजिश और हत्या की इतनी दास्तानें इस उपन्यास में दर्ज हैं कि बहुत कम ही पेज ऐसे होंगे जहां किसी हत्या की गवाही न हो. सत्ता कितने बेगुनाहों के खून में रंगी होती है, यह उपन्यास इसकी मिसाल देता है. जैसे :‘बादशाह सलामत के हुक्म से अधम ख़ान कोका को छत से नीचे फेंक दिया गया. पहली बार में वो नहीं मरे तो दूसरी बार सर के बल फेंका गया. इस बार उनकी गर्दन टूट गई और वो खत्म हो गए. इसके बाद बादशाह सलामत ने माहम अंगा के पास जाकर कहा, ‘मामा (मां) अधम ख़ान ने हमारे अतका को मार डाला. हमने उसका बदला लिया है.’

शाज़ी ज़मा ने हर चीज का ब्योरा इतने तफ्सील से दिया है कि आंखों के आगे एक फिल्म सी चलती महसूस होती है. जंग-ए-मैदान का वर्णन करते हुए एक जगह वे लिखते हैं – ‘हेमू के पास कुल तीस हजार क़ाबिल अफ़ग़ान और राजपूत घुड़सवार थे. इसके मुकाबले में शाही फ़ौज का क़रावल दस्ता छोटा था. उसमें लगभग दस हज़ार लोग थे जिनमें पांच हज़ार ही लड़ाके थे. जंगी हाथियों के सामने शाही फ़ौज के क़रावल दस्ते के पांव उखड़ ही जाते लेकिन तीरंदाज़ों ने हाथियों पर वो हमला किया कि हेमू की फ़ौज में अफ़रातफ़री फैल गई. ख़ुद हेमू की आंख में एक तीर लगा और ख़ून बहने लगा. यह देखकर उनकी फ़ौज का हौसला टूट गया. हेमू अपने हाथी हवाई पर मैदाने जंग से भाग ही रहे थे कि ग़लती से पकड़े गए.’

बादशाह अकबर को उनके चलाए धर्म ‘दीन-ए-इलाही’ के लिए सदा याद किया जाता रहेगा. यह उपन्यास बड़ी गहराई में जाकर अकबर बादशाह की धर्मनिरपेक्षता के सफर के बारे में बात करता है. अकबर बादशाह की मौत पर आगरा के दरबार में मौजूद एक ईसाई पादरी ने कहा था, ‘न जाने किस दीन में जिए, न जाने किस दीन में मरे.’ उपन्यास पढ़कर उस पादरी की बात गहराई से महसूस होती है.
उस समय के एक मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूंनी बादशाह अकबर के बारे में लिखते हैं – ‘सुल्तान जलालुद्दीन अकबर ने जो बहुत सी ग़लत और इस्लामी शरीयत के खि़लाफ बातें लागू कीं उनमें से एक यह थी कि गाय का गोश्त खाना हराम कर दिया गया. इसकी वजह ये थी कि बादशाह बचपन से ही कट्टर मज़हबी हिंदुओं के साथ उठते-बैठते थे और गाय का एहतराम करना हिंदुओं के अक़ीदे के मुताबिक़ दुनिया की सलामती का सबब है… बादशाह गोमांस, लहसुन और प्याज़ के खाने और दाढ़ी वाले और इस तरह के लोगों से परहेज़ करने लगे थे और आज भी परहेज़ करते हैं… इसलिए हिंदुओं और उनके क़बीले को ख़ुश रखने के लिए, जो भी बातें उस जमात को नापसंद थीं, उन बातों को बादशाह ने बिलकुल छोड़ दिया था.’

ढेर सारे पात्रों और सियासी जीवन की भीतरी झलक लिए यह उपन्यास भारत में मुगल साम्राज्य के शासन काल की एक अच्छी तस्वीर खींचता है. हालांकि आम उपन्यास प्रेमियों को इस किताब में पात्रों के नाम पढ़ने (जैसे- जन्नत आशियानी हुमायूं बादशाह या फ़िरदौस मकानी बाबर बादशाह) में थोड़ी असहजता महसूस हो सकती है. साथ ही मूल कथ्य में उपकथाओं की भरमार भी कुछ उलझाती है, जिस कारण उपन्यास से जुड़ाव कई बार टूटता है. लेकिन, बादशाह अकबर के बारे में जानने का शौक रखने वालों के लिए यह एक खूबसूरत तोहफा है. मुगल इतिहास पर शोध करने वालों या उस दौर के तौर-तरीके जानने वालों के लिए भी यह उपन्यास बहुत मददगार साबित हो सकता है.

Lekhak . Md Alisher Hanfi
A/d .Bajrahan saran Bihar

Leave a Reply

Join Us on WhatsApp