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अनुच्छेद 370 के खिलाफ पीपुल्स एलाएंस-वीरेंद्र देवांगना

अनुच्छेद 370 के खिलाफ पीपुल्स एलाएंस::
जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के लागू होने के एक साल बाद कश्मीर कंेद्रित राजनीतिक दलों ने लामबंदी कर कश्मीर के विशेष दर्जे की पुनर्बहाली के लिए पीपुल्स एलाएंस फार गुपकार डिक्लेरेशन बनाई है।
बैठक की अगुवाई नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष डा. फारूक अब्दुल्ला ने की है। बैठक में पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, पीपुल्स कांफ्रेंस के चेयरमैन सज्जाद गनी लोन, माकपा नेता मोहम्मद युसूफ तारीगामी, अवामी नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुजफ्फर शाह, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट के चेयरमैन पूर्वमंत्री जावेद मुस्तफा मीर, पीडीपी के नईम अख्तर, पीपुल्स कांफ्रेंस के मौलाना इमरान रजा अंसारी, नेकां उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला, नेकां महासचिव अली मोहम्मद सागर, पूर्व विधायक खालिद नजीब सोहारवर्दी व अन्य-अनेक अलगाववादी क्षेत्रीय नेता शामिल थे।
हांलाकि इस बैठक के लिए कश्मीर के कांग्रेसी नेता जीए मीर को भी न्योता भेजा गया था, लेकिन वे इसमें शरीक नहीं हुए। प्रादेशिक कांग्रेस ने पहली बार समझदारी दिखाते हुए ऐसे बैठक में शामिल होने से इंकार कर दिया, जो भारतीय संसद द्वारा पारित कानून की खिलाफत कर रहा हो।
वहीं, जम्मू-कश्मीर के बीजेपी अध्यक्ष रविंद्र रैना ने कहा है कि गुपकार घोषणापत्र के एजेंडे को बीजेपी कड़ा जवाब देगी।
यह अजीब विडंबना है कि एक तरफ चीन और पाकिस्तान लद्दाख और कश्मीर में अशांति फैलाकर उसे हड़पने की हरचंद कोशिशों में लगे हुए हैं, वहीं, दूसरी तरफ भारत में रहने और जीने-खानेवाले लोग कलह की सियासत करके चीन और पाकिस्तान के मददगार बनने में आमादा नजर आते हैं।
5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35-ए की समाप्ति से जम्मू-कश्मीर के आमलोगों ने जिस तरह का राहत महसूस किया है और वे अपने-आप को देश की मुख्यधारा में समाहित करने लगे हैं, दरअसल यह इन विध्नसंतोषी नेताओं को रास नहीं आ रहा है। यह उनके स्वार्थपूर्ण एजेंडे में फिट नहीं बैठ रहा है। इससे उनकी राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आ रही है, इसलिए लामबंद हो गए हैं। यह तरीका खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की मानिंद है।
सवाल यह भी कि अब वे किस मुंह से कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत की बातें कर सकेंगे? क्या यह जिस थाली में खाना और उसी में छेद करना नहीं है? जबकि अलगाववादी इन नेताओं को भली-भांति ज्ञात है कि चीन लद्दाख व अरुणाचल प्रदेश तथा पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा मानने के लिए तैयार नहीं है।
ऐसे एलाएंस से तो दुश्मन देशों का दुस्साहस बढ़ेगा और एलाएंस की आढ़ लेकर वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भड़काऊ बयानबाजी करने लगेंगे। इससे तो यही लगता है कि वे चीन व पाकिस्तान के हाथों खेल रहे हैं।
इधर कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और एक भूतपूर्व मंत्री ने अनुच्छेद 370 की वापसी का ऐसा बेसुरा सुर मिलाया है, जो पार्टी के लिए आत्मघाती कदम हो सकता है। पाकिस्तानपरस्ती उन्हें महंगा पड़ सकता है।
ये सज्जन, जो बरसों तक केंद्र में मंत्री रहे हैं, उन्हें क्या यह नहीं पता कि अनुच्छेद 370 और 35-ए भेदभावपरक, अन्यायपूर्ण और उत्पीड़न के पर्याय थे। जबकि कांग्रेस के कर्ण सिंह, जनार्दन द्विवेदी, दीपेंदर हुड्डा, मिलिंद देवड़ा जैसे कई कांग्रेसी दिग्गजों ने अनुच्छेद 370 हटाए जाने का पूर्व में समर्थन किया है।
अब, समय आ गया है कि न केवल फारूख अब्दुल्ला व महबूबा मुफ्ती जैसे विध्नकारक नेताओं को सबक सिखाया जाना चाहिए, अपितु उनको भी नसीहत दी जानी चाहिए, जो यदा-कदा ऐसे मौके तलाशते रहते हैं, जिसमें वे मुल्क को परेशानी में डालकर अपना उल्लू सीधा कर सकें।
बेशक, वे मोदी और भाजपा की उन नीतियों के विरोधी हो सकते हैं, जो देशहित में नहीं है, लेकिन उन कार्रवाइयां का समर्थन न सही, विरोध तो नहीं करना चाहिए, जिनसे दुश्मन देशों को बात का बतंगड़ बनाने का हौसला बढ़ता जाता है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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