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जख्म-रीता-कुशवाहा

लगता है कोई बैठा है
कमरे के इक कोने में,घोर घुप्प अंधेरे में
इक भी चिराग नही है रौशन
शायद जख्म अंधेरे से भी गहरा है उसके सीने में।

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