कैसे जण दूँ बेटी-दीप जांगड़ा

कैसे जण दूँ बेटी-दीप जांगड़ा

भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना

गीता भगवत इब झूठी पड़ गी झूठी हो गई नीयत दुष्ट की
झड़ गया ज्ञान का सच्चा मोती आत्मा चपेट मैं आगी कुष्ट की
समझया करते पैर की जुत्ती इब उस तै भी बदतर होगी
भाग बुलाया करते जिस नै उसकी जिंदगी नरकस्तर होगी
मौत तै बड़ी कोई सज़ा नही थी या कार मौत नै छोटा करगी
क्यूँ तनै मै धरत पै ल्याया क्यों ना लाड़ो तू कौख मै मरगी
तेरा तिरस्कार ही आच्छा था लाड़ो तेरा जन्म पसंद रहया ना
भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना

मारण तै जनणा आच्छा लाग्या तनै इस धरती पै ले आई
इब हर नै कोसूं के घर नै के दुश्मन तनै या कार कमाई
तेरे जन्म की खुशी मना कै बेटी कर दिया के पाप मनै
इस दिन का बेरा होता तो लाड़ो मै मार देती आप तनै
तनै आपणा भाग बताया करता तेरे बाबू के सत्त हार लिये
फेर जन्म ना ओटीए लाड़ो तू खुद नै कौख मै मार लिये
तेरी कोए रुखाली ना जग मैं तेरा कोई धर्म कोई गोत नही सै
तू मेरे पेट मैं मर ज्या ऐ तेरा न्यू मरणा कोई मौत नही सै
तेरे कातिल भेड़िये सुन्ने हांडै इस्तै बड़ा कोई मन्द रहया ना
भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना

घणे नारे लाग्या करते अक बेटी नै बचाओ ओर पढ़ाओ नै
किस मुँह बात करूं जामण की किस कौख तै जणु बताओ नै
जो पहलां जाम्मी उसका तो के हाल हो लिया देखो नै
लेखां मै होगी तो फ़ेर जाम दयूं थम बैठ चिता पै सेको नै
मै कर्म की हिणी कोन्या थी मेरी लाड़ो कहती मरगी
मरणे का दुख ना होया इसी जिंदगी जीण तै डरगी
भाई मरगे माँ मरगी मरगया बाबू आज कति जीवते जी
दादा मरगया दादी भी कहै कोई कदे नही जामियो धी
कद मिटै पापी लोग जगत तै के इन खातर कोई सन्द रहया ना
भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना

हाथ टूट गे कानून के लाड़ो जीवण पै तेरे दाग लाग गया

इस बहम मै ना जणीयो बेटी के लोग कहैंगे भाग जाग गया
बेशक घीटी दाब मार दयो मन तो समझाया जावैगा
ईसा दाग जिस बाप कै लागै वो क्यूकर जून हंडावैगा
इब ना रह रया रूप लक्ष्मी बेटी लोगों स्याणे होज्यो
ना रुकणे ये पाप किसे पै बेशक घर घर थाणे होज्यो
दीप तू लाड़ो माँगै था रै इब बता नै क्यों चुप होगया
वा भी तो तेरी बेटी थी जिसकै घर मै अंधेरा गुप होगया
मानूँ सूँ तेरी कलम सुधर गी तेरे शब्दां मैं गन्द रहया ना
भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना

 

         

    दीप जांगड़ा

 

 

 

 

 

 

 

Deep Jangra

मैं दीप जांगरा कैथल हरियाणा का निवासी हुँ। मैं वीर रस का कवि हूँ।

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