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लोकतंत्र-अभिराज राजपूत-राजपूत

संविधान मैं कहूं,या कहूं एक मकड़ी का जाला।
पढ़ते हैं वहु लोग,ना मिले कोई समझने वाला।
जनता अनपढ़ अनजान,बो इसमें प्रतिउत्तर क्या देगी?
जाले में जीवन जीकर,क्या लोकतंत्र पा लेगी?
ज्ञानवान धनवान,विधि का जटिल ज्ञान रखते हैं।
रखते हैं अभिमान,मगर सम्मान कहां रखते हैं।
जो झंडाबरदार न्याय के,निकट इन्हें लाओगे।
मर्यादा से दूर,विधि के उलट करम पाओगे।
लोकतंत्र की लूट,लुटेरों के मुख पर लाली है।
मेहनत करते दिन रात,पेट मजदूरों के खाली है।
उद्योगों की बुनियाद टिकी,इनके छोटे धंधों पर।
संविधान का भार,इन्हीं लुटते दरिद्र कंधों पर।
कई शोषित गुमराह, हमें इनके दर जाना होगा।
अनुच्छेदों का सार, सरल शब्दों में समझाना होगा।
संविधान का पाठ, झोपड़ी में गाया जाएगा।
सत्य रूप उस दिन, भारत में लोकतंत्र आएगा।
-: Abhiraj Rajput

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