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मासिक प्रतियोगिता माह अक्टूबरः धरती पुत्र के सपनों का हत्यारा कौन? लोकतंत्र या आपदा? बेरोजगारी के जिम्मेदार कौन, युवा या सरकार? मोदी सरकार के पांच सालों पर सवाल? निजी सपनों की चाह या विकास की राह?-वीरेंद्र देवांगना

मासिक प्रतियोगिता माह अक्टूबरः:
धरती पुत्र के सपनों का हत्यारा कौन? लोकतंत्र या आपदा?::
बेरोजगारी के जिम्मेदार कौन, युवा या सरकार?::
मोदी सरकार के पांच सालों पर सवाल? निजी सपनों की चाह या विकास की राह?::
धरतीपुत्रों का सपना क्या है? भरपूर उपज हर साल होना और बाढ़-सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचे रहना। टिड्डीदल-पशुदल व विध्न-बाधा से अपनी फसल को बचाए रखना।
वहीं, अन्य विपदाओं जैसे बादल का फटना व भूस्खलन आदि से फसल की नुकसानी का भरपाई प्राप्त करना, ताकि बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, उनकी शादी-ब्याह, बड़े-बूढ़ों की बीमारी, दवा, परवरिश व आगामी फसल के खर्चे को पूरा किया जा सके।
लेकिन अफसोस कि किसान का फसल नैसर्गिक व विविध प्रकोपों से निरापद नहीं रहा करता। उसे साल में एक बार किसी-न-किसी प्राकृतिक आपदा का सामना करना ही पड़ता है।
तिस पर तुर्रा यह कि जब वह फसल लेकर मंडी जाता है, तब उसको शासन द्वारा निर्धारित एमएसपी भी नसीब नहीं होता। व्यापारी उसकी फसल को खरीद भी लेता है, तो समय पर भुगतान नहीं मिलता। लिहाजा, खुले बाजार की ओर रुख करता है और औने-पौने दामों में देकर खून के आंसू बहाता है।
किसानों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण यही है। वह प्राकृतिक प्रकोप की नुकसानी से उतना व्यथित नहीं होता, जितना कि व्यवस्थागत बदमाशियों से। उसको लगता है कि उसकी उपज से उसको लागत-मूल्य भी नसीब नहीं हो रहा है और वह कर्ज में धंसता चला जा रहा है। इसीलिए, आत्महत्या जैसा आत्मधाती कदम उठाता है।
यह बात नहीं कि किसानों की दुर्दशा केवल लोकतंत्र की देन है। जब राजशाही या सल्तनतशाही, मुगलशाही या ब्रितानीशाही था, तब भी किसानों से उनकी उपज का चैथाई, आधा या दो-तिहाई लगान जबरिया वसूल लिया जाता था।
आमिर खान की मशहूर फिल्म ‘लगान’ इसी सच्चाई को उजागर करती है। ‘दो बीधा जमीन’, ‘मदर इंडिया’ ‘उपकार’ जैसी फिल्में किसानों की दुर्दशा को ही बयां करती हैं।
देखना यही है कि किसानों के हित के लिए पारित किए गए तीन नए कृषि विधेयक किसानों की दुर्दशा को किस हद तक दूर करते हैं।
बेरोजगारी के जिम्मेदार कौन, युवा या सरकार?
बेरोजगारी के लिए जितना जिम्मेदार सरकार है, उतना ही जिम्मेदार युवावर्ग भी है। सरकार इसलिए जिम्मेदार है कि उसके पास युवाओं को काम देने के लिए उतनी नौकरियां नहीं हैं, जितने युवा पढ़-लिखकर शिक्षण संस्थानों से निकल रहे हैं। केंद्र व राज्य सरकारों के सरकारी कार्यालयों में लाखों पदरिक्तियां हैं, परंतु उस अनुपात में भरतियां नहीं होती।
युवा और उसके अभिभावक इसलिए जवाबदार हैं कि वे डिग्री को नौकरी की गारंटी मान बैठे हैं। जबकि युवाओं को हुनरमंद होना चाहिए। कहा भी गया है-हुनरमंद को मौके हजार। उन्हें काबिल बनना चाहिए; क्योंकि काबिल नौकरियों के पीछे नहीं, नौकरियां उनके पीछे चला करती हैं।
मोदी सरकार के पांच सालों पर सवाल? निजी सपनों की चाह या विकास की राह?
मोदी सरकार पर ऐसा सवाल वे उठाते हैं, जो पिछली सरकारों के कुशासन और भ्रष्टाचरण से या तो आंखें मूंदे हुए हैं या उससे अनजान हैं। नोटबंदी, जीएसटी, सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, तीन तलाक, वन रैंक वन पेंशन, अनुच्छेद 370 की समाप्ति और जम्मू-कश्मीर का एकीकरण, नागरिकता कानून, किसानों व छोटे व्यापारियों का पंेशन, आतंकवाद पर लगाम, पाकिस्तान को पैगाम, चीन से दो-दो हाथ करने का माद्दा किसी सरकार में है-तो है मोदी सरकार!
आज महाशक्ति चीन, भारत से डरने लगा है, तो मोदी की सफल विदेश-नीति का कमाल है। पूर्ववर्ती सरकारों के जमाने में दुनिया में केवल रूस हमारे साथ था। आज चीन-पाकिस्तान-तुर्की को छोड़कर सारी दुनिया हमारे साथ है। यह क्या किसी उपलब्धि से कमतर है?
यह कोई निजी सपनों की चाह नहीं, केवल विकास की राह है। मोदी का अपना कुछ नहीं है। उनकी माता 10 बाई 15 के कक्ष में रहती है। उनके भाई भतीजे जैसे पहले थे, आज भी वैसे ही हैं। उनपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है। उनकी छवि बेदाग है। वे जब कभी बोलते हैं, उनका एकमेव मकसद भारत को आगे, और आगे ले जाने का रहा करता है।
मोदी सरकार ने ही देश को जहां बुलेट टेªन, ई-वाहन, स्वर्णिम चतुर्भज सड़क योजना, बंदरगाह विकास, वायु सेवाओं का विस्तार, सी-प्लेन, नदी जलमार्ग और अनेक राष्ट्रीय राजमार्गों की सौगातें दी हैं, वहीं कृषि विधेयक,, नागरिकता कानून, समान नागरिक संहिता, भूमि सुधार, लोकपाल, खेलो इंडिया कैंपेन सहित अनेक स्मरणीय बदलावों व सुधारों का बीड़ा उठाया है।
मोदी सरकार ने ही दुनिया के उस सबसे लंबे 9 किलोमीटर सुरंग को कम समय में पूर्ण किया है, जिसको अटल टनल, रोहतांग कहा जाता है, जिसका शिलान्यास 2010 में तात्कालीन सरकार ने किया था और कछुआ चाल से 2013 तक महज डेढ़ किलोमीटर बनवाया था। 2014 में सत्तासीन होते ही मोदी सरकार ने इस सड़क परियोजना को पूर्ण करने का संकल्प लिया और 3 अक्टूबर 2020 को राष्ट्र को समर्पित किया। यही नहीं, मोदी सरकार ने उन तमाम विकास परियोजनाओं को पूर्ण किया है, जो बरसों से लटके हुए थे।
बच्चों का भविष्य गड़ने के लिए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लाई जा रही है। बैंकों में धांधलियों को रोकने के लिए रिजर्व बैंक को सक्रिय किया गया है। कृषकों को खुला बाजार उपलब्ध कराने के लिए तीन कृषि बिल लाया हैं, जो एमएसपी की व्यवस्था को बरकरार रखेगा और बिचैलियों व दलालों से कृषकों को छुटकारा दिलाएगा।
मोदी सरकार ने तुष्टीकरण की नीति का परित्याग कर दिया है और वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना के लिए कार्यरत है। उसने हर वर्ग को समान महत्व दिया है।
मोदी सरकार जैसा ताकतवर सरकार श्रीमती इंदिरा गांधी के बाद अब देखने को मिल रहा है, जो देशहित में सख्त निर्णय ले रही है, तो ढुलमुल व लुंज-पुंज निर्णय लेनेवालों, योजनाओ को लटकानेवालों, भ्रष्टाचारियों, दलालों, अपराधियों, दो नंबरियों, बेईमानों, देशद्रोहियों, टुकड़े-टुकड़े समूहों व कुशासन के हिमायतियों को तकलीफें हो रही है, इसलिए दुष्प्रचार में लगे रहते हैं।
मोदी सरकार निजीकरण पर इसलिए जोर दे रही है कि इससे सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा, हड़तालों पर अंकुश लगेगा, योग्य युवाओं को नौकरियां मिलेंगी, कार्य-संस्कृति का विकास होगा, जिसका फायदा अंततः देश को ही मिलेगा।
हां, यह संभव है कि एक सरकार के नाते मोदी सरकार से भी कुछेक गलतियां हो सकती है, लेकिन यह कहना गलत है कि मोदी सरकार निजी सपनों की राह का राही है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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