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सत्ता बदलने से व्यवस्था नहीं बदलता::-वीरेंद्र देवांगना

सत्ता बदलने से व्यवस्था नहीं बदलता::
देश में आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 से 24.03.1977 तक लगातार 30 साल तक कांगे्रस का एकक्षत्र राज रहा, जिसमें पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और श्रीमती इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री रहीं। इन्होंने अंगेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को हूबहू अपनाकर अंगे्रजों की कुनीति व लूटनीति को ही आगे बढ़ाने का ही कुटिल काम किया।
इसमें लाल बहादुर शास्त्री को अलग किया जा सकता है, क्योंकि उन्हें महज डेढ़ साल जून 1964 से जनवरी 1966 तक शासन करने का अवसर मिला और उनका रूस के ताशकंद में संदिग्ध परिस्थितियों में 11 जनवरी 1966 को दुःखद निधन हो गया, जिसकी सच्चाई आजतलक देश के सामने नहीं आ पाई है।
24.03.1977 को पहली बार देश में सत्ता परिवर्तित होकर पांच दलों की मिली-जुली जनता पार्टी की सरकार को मोरारजी देसाई ने नेतृत्व दिया। यह सरकार अपने अंतर्विरोधी से ढाई साल में ही गिर गई। इसके बाद चैधरी चरण सिंह ने भी 28.07.1979 से 14.01.1980 तक कांग्रेस के समर्थन से सरकार चलाया।
आशय यह कि आपातकाल के दंश से उबरने के लिए और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ के आव्हान के बाद 1977 में सत्ता तो बदली, जिसकी खुशी सब दूर महसूस की गई, लेकिन कांग्रेसी दुव्र्यवस्था में कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुआ।
इसी ‘संपूर्ण क्रांति’ से निकले लालू प्रसाद यादव आज भ्रष्टाचारियों के सिरमौर के रूप में जेल की हवा खा रहे हैं। मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और उस समय के तमाम नेताओं पर अनैतिकता और कदाचरण के अनेक आरोप लग चुके हैं, जिन्होंने अपना ही स्वार्थ साधा।
भावार्थ यह कि जनता ने जिस उम्मीद से जनता पार्टी को वोट दिया, उसका एकांश भी पूरा नहीं हुआ। कांग्रेसी सरकारों के दौर में जो जनसंख्या, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, आरक्षण, भाई-भतीजावाद, लालफीताशाही, नौकरशाही, भर्राशाही, दफ्तरों में लेटलतीफी थी, वही जनता पार्टी की सरकार में भी बदस्तूर जारी रही। शासन-प्रशासन वैसा ही चलता रहा, जैसा कांग्रेसी सरकारों के दौर में धिसट-धिसटकर चला करता था।
विदित हो कि इसके बाद हुए आमचुनाव से 14.01.1980 से 02.12.1089 तक श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी (मां-बेटे) का करीबन 9 साल का कार्यकाल रहा।
इंदिरा गांधी की शहादत के बाद हुए आमचुनाव में राजीव गांधी प्रचंड बहुमत से जीत कर आए। इसके बावजूद उन्होंने कोई साहसिक और व्यवस्था में परिवर्तनकारी निर्णय नहीं लिया। जैसा चल रहा था, वैसा ही चलने दिया।
तत्पश्चात बोफोर्स के तूफान में जनता दल की सरकार 02.12.1989 से 21.06.1991 तक बनी, जिसमें विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर क्रमशः प्रधानमंत्री बने। इन महानुभावों ने भी कांग्रेसी तौर-तरीकों और लटकों-झटकों को अपना लिया। फलतः जनता ठगा-सा महसूस करने लगी।
गौरतलब यह भी कि इसके बाद पुनः पीवी नरसिंम्हाराव 21.06.1991 से 16.05.1996 तक कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहकर अपना कार्यकाल जैसे-तैसे पूरा किए। उनका कार्यकाल भी अल्पमत में रहने के कारण कोई उल्लेखनीय नही रहा। उल्टे यह सरकार झामुमो और अन्य सहयोगियों के हाथों की कठपुतली बनी रही।
इसके उपरांत अटल बिहारी बाजपेयी की तेरह दिनी सरकार रही, जो लोकसभा में विश्वासमत प्राप्त नही कर सकी। फिर आई, एचडी देवगौड़ा और वाईके गुजराल की सरकार जो मार्च 1998 तक जिस-तिस तरह धिसटती रही। ये सरकारें भी सहयोगी दलों का खिलौना ही बनी रही।
तदुपरांत भाजपानीत एनडीए की सरकार अटल बिहारी बाचपेयी के नेतृत्व में 1999 में बनी, जो बाचपेयीजी के करिश्माई नेतृत्व के कारण जैसे-तैसे अपना कार्यकाल पूरा की।
हालांकि इसके समर्थक दलों के नेता खासकर तृणमूल कांग्रेस की ममता बेनर्जी और अन्ना द्रमुक की जयललिता इनकी नाक में दम कर रखे थे, फिर भी इन्होंने कांग्रेसी कुशासन को ही आगे बढ़ाने का काम किया। इस दौर में भी जनता जिस उम्मीद से वोट की थी, उसका दशमांश भी पूरा नहीं हुआ। अटल बिहारी जैसा नेता भी व्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं ला सका।
गौरतलब यह भी कि 2004 में डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में बनी कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार 10 साल तक देश में राज की, लेकिन इनका शासन भी व्यवस्था में परिवर्तन करने के बजाए सहयोगी दलों का खिलौना बनी रहकर भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी रही। खासकर यूपीए-2 की सरकार के तो क्या कहने? इस सरकार के कार्यकाल में एक के बाद एक घोटाले सामने आए। सरकार मौनी बनी रही और जनता की आशाओं व आकांक्षाओं पर पानी फिरता रहा।
30 साल बाद 26 मई 2014 को फिर एक बार भाजपा अपने सहयोगियों के साथ पूर्ण बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई, जिसको नरेंद्र मोदी ने नेतृत्व दिया। इस सरकार के आने से उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार की खबरें नहीं आई। इसकी आक्रामक विदेश नीति से चीन-पाकिस्तान के दांत खट्टे हुए, जिसमें सर्जिकल स्ट्राइक व एयर स्ट्राइक भी शामील है।
इस सरकार तीन तलाक विधेयक लाने, हज सब्सिडी खत्म करने, जीएसटी और नोटबंदी, स्वच्छ भारत जैसे आर्थिक व सामाजिक सुधार क्षेत्र में महती कार्य किया। लेकिन यह सरकार भी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन नही कर सकी।
परिणाम यह हुआ कि कालाधन वापस नहीं आया, बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी कम नहीं हुई। टेªनों की लेटलतीफी जारी रही। पोस्ट आफीस, बैंकों, रेलवे और तमाम सरकारी कार्यालयों में रिक्तियों के विरूद्ध भर्तियां नहीं हुई। पुलिस-प्रशासन में कोई सुधार नहीं हुआ।
स्थानीय निकायों में भर्राशाही, भाईभतीजावाद और लालफीताशाही जारी रहा और आज भी बदस्तूर जारी है। विश्वविद्यालयों की परीक्षाएं समय पर नहीं हुई। प्रतियोगी परीक्षाओं में भारी धांधलियां हुईं। लोग जरा-जरा काम के लिए के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाए। सरकारी दफ्तरों में काम का वही ढर्रा चालू रहा, जिसके लिए वह बदनाम है और जो जनता की परेशानी का सबसे बड़ा कारण है।
हां, यह सरकार विकास खूब कर रही है। सरकारी खर्चे से विज्ञापन देकर ढिंढोरा भी पिट रही है। लेकिन, ऐसा विकास किस काम का, जिसमें जनता को पानी नसीब न हो। पर्यावरण प्रदूषण में भारत सरताज हो। गरमी में तमाम नदियां या तो सूख चुकी हों, या सूखने के कगार पर हों। उद्योग, मानव के मल, पशुओं के गोबर व कचरे नदियों मे ंफेंके जा रहे हों।
आधे से अधिक जीवनदायिनी और पतितपावनी नदियां दूषित हो गई हों। वह पीने के लायक तो दूर, आचमन करने के लायक भी नहीं रह गई हों। लोगों को सांस लेने के लिए शुद्ध हवा नहीं मिल रही हों। सड़क और अन्य निर्माण कार्याें के लिए अंधाधुंध वनों और पेड़ों का विनाश किया जा रहा हो। इन सबको दुरुस्त करने का काम आखिर सरकार का ही है।
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विशेष टीपःः वीरेंद्र देवांगन की ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome से जाकर amazom.com/Virendra Dewangan में देखा जा सकता है।

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