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दुख ही भला,सदां न किसी को होय

(101)सोनू जे दुख ही भला,सदां न किसी को होय। जब आये सो जान पड़े,मीत कुमीत है कोय।।(102) शरीर पाया तो क्या हुआ,गर्ब करो न कोय। सबका शरीर नश्वर है,अमर न किसी का होय।। (103) जब नर का बेर उत्तम रहे,तब अति सुख सम्पत्ति पाय। जब नर का बेर उत्तम नहीं,किस्मत बदली जाय ।।(104) कुसंग पर बिपत्ति आत नहीं,उत्तम पर आत अपार। जब जो जैसा प्रांण तजे,सो तैसा खुले द्वार।। (105) सोनू ऐसे काम कीजिये,जिससे हो पहिचान। मिले जगत में इसी से,मान और सम्मान।। (106) प्रीत सभी से कीजिये, हिन्दु हो या मुस्लमान। जात धर्म को भूलके, इन्सान को पहिचान।। (107) सोनू के सत्य मार्ग पर, बिपत्ति आत अपार। जो बहुरि पीछे न हटे, हो जाये सो पार।। (108) जो आया सो बोल रहे, मरी शरम और लाज। बड़े न देखे कोई भी, सोनू जग में आज।। (109) अपनो को कभी न छोड़िये, कोऊ न सदां बिलमाय। दो चार दिन देगा बहुत, फिर कहां को जाय।। (110) सोनू जा संसार में, दुखों का है भण्डार ‌। ऐसे पद को खोजिये, जौ छूट सके संसार।। (111) सबै सहायक देह के,कोऊ न आत्मा सहाय। सोनू सबै को छांड़ि दे, हरि को ले अपनाय।। (112) माया सैं प्रीत न कीजिये,हरि सैं करि है प्रीत। माया सैं करे सो हार मिले,हरि सैं करे सो जीत।। (113) शूरबीर पथ से न हटे, पूरंण करे पार। रोकैं रूकायैं न रूके, ज्यों नदी की धार।। (114) हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई, सबका ईश्वर राम। ईश्वर अल्लाह गोड बाह गुरू, सिर्फ अलग है नाम।। (115) हिन्दु हो या मुस्लिम हो, या हो सिख ईसाई। सबका ईश्वर एक है, सम्मान करो सब भाई।। (116) हिन्दु हो या मुस्लिम हो, या हो सिख ईसाई। सबका ईश्वर एक है, आपस में लड़ो न भाई।। (117) सोनू जा संसार से, गायब हो गई प्रीत। घर -घर में बैर फूट है, बदल गई है रीत।।(118) निन्दा करे न माटी की,जिस पर लागे कोय। एक दिन ऐसा होत है, हर कोई माटी होय।। (119) सुख पाया तो क्या हुआ, जादां खुशी न होय। पत्ता सदां न खिला रहे, कभी तो मुर्झाये बोय।। (120) कह रहा तो कहलेने दे, बस रखैं रह मोन। सब ईश्वर पर छोड़दे, उससे बढ़के कोन।। (121) जैसा था सो भूलजा, अपना गुजरा कल। पीछे मुड़के देख नहीं, आगे देख के चल।। (122) मुख से खाना खाले, मन से जपले राम। पैरों से चल फिर ले, हाथों से करले काम।। (123) जीबन का कुछ पता नहीं, आज जात कै कल। सोनू कभी भी टूट सके, ज्यों तरबर का फ़ल।। (124) अपने मन की मानिये, और न मानिये कोय। सोनू आज के युग में, बेटा न बाप का होय।। (125) सोनू कहे संसार में, बिपत्ति का साथी कौन। साथी बिपत्ति का बही, खुद बिपत्ति में जौन।। (126) सोनू कर्ज तो लीजिये, पर चुकई ये हाल। जो गड्डर खोदतु गयो, पूरन लगजाय साल।। (127) काम तूं ऐसा कीजिये, ऐसा बना बेहार। सब कोई करै बड़ाई, जब तजे संसार।। (128) कुसंग का करना न भला, और न भला बेकार। दूध पिलाव चाहै पद धरो, फिर भी देत बिसार।। (129) अन्य दान का मान रखि, गररा न इन्सान। अन्य दान जो न मिला, निकल जायैंगे प्रान।। (130) जैसा जब था सो अब है, सब कुछ एक समान। सूर्य बदिला न चन्द्रमा, सिर्फ बदल गया इंसान।। (131) सोनू जा संसार में, जो अच्छे करे काम। जाये अंत शमय में, बही सुरग धाम।। (132) नयी सदी में न सुने, कोई ज्ञान की बात। बुरी बातैं सब सुने, और कछु न भांत।। (133) सोनू दुखी न होइये, कितनी भी आये पीर। पत्ता तो सदां धूप सहे, फिर भी रखैं रह धीर।। (134) सोनू ज्ञान को पायके, ज्ञानी होत न कोय। जीबन में उतारे जो इसे, बो सच्चा ज्ञानी होय।। (135) बोल रहा तो क्या हुआ, जो कड़बा बोलतु होय। ज्यों काले कौआ को,नेक कहित न कोय।। (136) गरज रहा तो क्या हुआ, जैसे काला बदिराय। गरज-गरज रह जात है,बरखा न करि पाय।। (137) खिलायें पिलायें का भये,जो पर होत कुसंग। चाहे पृतिदिन दूध पिला, बिष ही देत भुजंग।। (138) सोनू कबहुं न पहुंचाइये, उत्तम नर खौं ठेष। न जाने करता कहां मिले, कब कौन के भेष।। (139) जिसमें प्रीत होत नहीं, खात पियत मदिरा मास। ऐसे घर कुघर में, नहीं ईश का बास।। (140) सोनू बेठा क्या करे, करिते रह दो काम। दुर्बल की सहाय करि,ले पल-पल राम का नाम।। (141) जो मोह माया को छोड़के,सिमरे रोज हरि। कहे सोनू बे लोग ही,जग सैं होत बरि।। (142) जिसमें प्रीत होत नहीं,खात पियत मदिरा मास। ऐसे घर कुघर में,रिस्तों की करो न आश।। (143) नर से तो कितना भला,उस तरबर का पात। बो मुर्झाये चाहे खिले,छाया करता जात।। (144) जिसके अंदर मांफी दया,और प्रेम सच्चाई। उस इन्सान के पास ही, दिल होता है भाई।। (145) बक्त पड़े पर साथ दे,होता सच्चा मीत। सोनू सच्चे मीत से,जीबन भर करो प्रीत।। (146) सुजान बिध्या दीजिये,तुझि में रहि सम्म। सूर्य सदां प्रकाश करे,होत कबहुं न कम्म।। (147) अति नहीं तो कछु तो,सुता में लच्छन गुन आत। कबई सैं कबरा होत नहीं,तो छिटकबरा पात।। (148) बिपत्ति आये तो क्या हुआ,जो सत्य बादी हो इन्सान। अति बजन भी न तोड़ सके, ज्यों पक्की नीब का मकान।। (149) जग में बड़ाई होत नहीं,कोऊ बड़ाई पाय। बड़ाई ताकी होत है,जो परहित जाय।।(150) जो उसको भी मांफ करे,मांफी के न काबिल। बो बढ़िया इन्सान है,बढ़िया उसका दिल।।

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