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वीर कर्ण और भगवान श्री कृष्ण की पहली मुलाकात-कवि दुर्वेश सिंह

वीर कर्ण से जो , मिलने चले हैं वासुदेव l
नटवर सारथी का, भेष जो बनाया है ll
कल्पना भी कर ना ,सकेंगे आज आप सुन l
कर्ण प्रतिद्वंदी के ,रूप में जो आया है ll
लेने प्रतिद्वंदी को ,नटवर का भेष धर l
वासुदेव ने ऐसी ,लीला को रचाया हैll
बचन से बध्द कर्ण, वचन निभाने कर्ण l
सारथी समझ स्वयं ,श्याम संग आया है ll
रास्ते में लीलाधर, लीला को दिखाने लगे l
रथ के जो चक्र को हां ,धरा में धशाया है ll
बार-बार कोशिश ,धरा से चक्र निकालने कीl
अंगराज ने जो सारे, बल को लगाया है ll
हिल भी ना सका रथ, साथ नटवर के जो l
स्वयं नटवर ने जो ,हाथ को लगाया है ll
स्पर्श मात्र से ही ,नटवर के चक्र फिर l
धरा में धंसा था चक्र, निकल बाहर आया है ll
अंगराज चिंतित हो ,नटवर को देखते हैं l
ये नटवर है या ,भेष में कोई आया है ll
आज अंगराज की ,महानता को दृष्ट देने l
स्वयं नटवर के जो ,भेस को बनाया है ll
आज राधे कर्ण कि, जो गुणों में परीक्षा है l
सतो, रजो, तमो, गुण श्याम ने सिखाया है ll
रणभूमि पहुंच के, देखते हैं अंगराज l
केवल एक पक्ष है ,तो दूजा क्यों नहीं आया हैll

(जब कर्ण शयाम को पहचान लेता है)

सारी बातें सोच राधे ,चिंतन मनन करें l
हाथ जोड़ बोलते हैं ,दरश दिखाओ ना ll
शयाम वोले……..
सारथी हूं महारथी का, मन पढ़ लेता हूं मैं l
इस बात पर तुम, इतनी चिंता को जताओ ना ll
कर्ण वोला…….
जन्म मेरा धन्य हुआ, पाकर ऐसा सारथी जो l
मेरे आराध्य कृष्ण रुप में ,तुम आओ ना ll
जरासंध को जो मैंने ,वचन दिया था उसे l
कैसे मैंने निभाऊ कुछ ,मार्ग तो दिखाओ ll
बोले श्याम आगमन से, बचन जो पूर्ण हुआ l
वीर महारथी हो तुम, विवेक लगाओ ना ll

वीर कर्ण से जो ,मिलने चले हैं बासुदेव l
नटवर सारथी का ,भेष जो बनाया है ll….
‌ ©®दुर्वेश सिंह

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