Notification

आलोचना अकेले में; प्रशंसा सबके सामने-वीरेंद्र देवांगना

आलोचना अकेले में; प्रशंसा सबके सामने::
हम किसी को ताना-उलाहना देते हैं या किसी की आलोचना करते हैं, तो सबके सामने बुराई करने लग जाते हैं और प्रशंसा करनी हो, तो पीठ पीछे करते हैं। इससे लाभ कुछ नहीं होता, उलटे सामनेवाले के दिल को ठेस पहुंचती है। उसकी भावनाएं आहत होती है।
इसलिए, किसी के खिलाफ नुक्ताचीनी करने की आवश्यकता हो, तो उसे अकेले में करना चाहिए, ताकि उसका मान-सम्मान बना रहे और आप अपनी बात कह भी सकें। अन्यथा होता यह कि वह आपकी बात को समझना छोड़कर आपको अपना दुश्मन समझने लग जाता है। आपका सम्मान करना छोड़ देता है, आपसे कतराने लगता है, मुंह फेर लेता है।
अतः, संबंध खराब करने से बेहतर है कि आप किसी की आलोचना तब करें, जब वह अकेले में हो या अकेले किसी कमरे में बुलाकर कहंे। इससे जहां आपकी बात पूरी तरह से सुनी जाएगी, वहीं संभावना है कि आपसी रिश्ता व मित्रता बनी रहेगी। इसका फायदा यह भी होगा कि वह आपकी बात सुनकर उसे अमल में लाना आरंभ कर देगा।
इसी तरह प्रशंसा अकेले नहीं, सबके सामने करना चाहिए। सबके सामने की गई सराहना जहां संबंधित की विश्वसनीयता बढ़ाता है, वहीं वह आपको दिल से शुक्रिया भी अदा करता है।
ऐसा हजगिज नहीं होना चाहिए कि सामने तो तारीफ के पुल बांध दिए, पर पीठ पीछे बुराई करने लग गए। यदि ऐसा किया जाता है, तो इसकी सच्चाई लौटकर एक-न-एक दिन आपके सम्मुख आएगी और आपका सुख-चैन हर लेगी। आपके व्यक्तित्व को धूमिल कर चुगली करनेवालों की श्रेणी में ला खड़ा करेगी।
–00–

Leave a Comment

Connect with



Join Us on WhatsApp