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क्षमा वीरस्य भूषणम-वीरेंद्र देवांगना

क्षमा वीरस्य भूषणम::
क्षमा वीरों का आभूषण है। यहां वीर का आशय युद्धवीर से नहीं, कर्मवीर से है। युद्धवीर संग्राम के उपकरणों से युद्ध लड़ता है, तो कर्मवीर कर्म के संसाधनों से संघर्षशील रहता है। कर्मवीर वह है, जो कर्मशील है। अपने काम को भली-भांति करना जानता है। उसका अपने काम पर पूरा नियंत्रण होता है। जो अपने काम को करने में निपुण होता है उसको कर्मयोगी भी कहा जाता है। जैसे योग क्रिया का मर्मज्ञ योगी कहलाता है, उसी तरह काम का विशेषज्ञ कर्मयोगी कहलाता है।
क्षमा वीरस्य भूषणम का सही अर्थ है, क्षमा उसे ही शोभा देती है, जो वीर है। वीर ही क्षमा करने के लायक बनता है। जबकि कोई किसी बात के लिए प्रतिरोध नहीं करता, क्योंकि वह प्रतिरोध करने की क्षमता ही नही रखता, तो यह कायरता है।
सवाल यह कि क्षमाशील वीरपुरुष कैसे हो सकता है? उसको तो आधुनिक समाज में कायर समझा जाता है। जबकि वीर और बहादुर उसको समझा जाता है, जो पलटवार करता है, अपने बाण से विरोधियों को चारों खाने चित कर देता है। यही विरोधाभास है, जिसे समझने की जरूरत है।
क्षमा वीरों का भूषण इसलिए है, क्योंकि यह वीरों के लिए ही शोभनीय है। कोई कायर यदि क्षमा करे, तो यह शोभनीय नहीं कहलाता। चूंकि वह खुद डरा-सहमा और भयभीत रहता है, इसलिए वह किसी को निर्भयता प्रदान नहीं कर सकता। यदि वह ऐसा करता भी है, तो औचित्यहीन व निरर्थक माना जाता है। लेकिन कोई वीर क्षमा करे, तो यह कीर्ति बढ़ानेवाला कीर्तिमान कहलाता है।
बड़ों, सयानों और बुजुर्गों से क्षमा की अपेक्षा इसलिए की जाती है कि वे अनुभवी होते हैं, दुनिया देखे हुए रहते हैं, दुनिया को समझे हुए रहते हैं। वे अपने-अपने कार्यों को पूर्णता में कर चुके रहते हैं और प्रोढ़ावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त रहते है। इसलिए कहा जाता है, ‘‘क्षमा बढ़न को चाहिए, छोटन को उत्पात’’
छोटे तो छोटे ही होते हैं। उनमें अनुभवहीनता होती है। दुनिया को समग्र में देखने का माद्दा नहीं होता उनमें। इसलिए वे उत्पाती होते हैं। उत्पात मचाते हैं।
दुष्टता का प्रतिरोध न करना कायरता है। कायरता अक्षम्य है। यह किसी के लिए भी हितकारी नहीं होता। लेकिन जब दुष्टों को प्रेमपूर्वक और नम्रतापूर्वक समझाया जाता है कि अति मत करो, परिणाम बुरा होगा। इससे किसी का भला नहीं होेगा, तो यह वीरता है।
ऐसी ही कायरता द्रोपदी चीरहरण के वक्त भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और स्वयं धृतराष्ट्र ने भी दिखाई थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि कौरव कुल का नाश हो गया। यदि ये महापुरुष वस्त्रहरण का प्रतिरोध करते, तो यह वीरता कहलाती।
गलत कर्म के प्रति चुप्पी साध लेना अधर्म है, तो वीरता से प्रतिकार करना धर्म। गलत को गलत न कहना भी कायरता है। इस पर मौन रहना भी कायरता है। इससे समाज में गलत करनेवालों का हौसला बढ़ता है और समाज मंे सुधार नहीं आता। वह निरंतर पददलित होता चला जाता है। बालीवुड में मादक पदार्थों के सेवन के प्रति नामचीन सितारों का खामोश रहना भी कायरता है।
स्वामी विवेकानंद कहते हैं, ‘‘व्यक्ति के कर्म उसका चरित्र बनाते हैं और सुदृढ़ चरित्र उसको वीर बनाता है। यही कर्मयोग भी है।’’
इसे चरमपंथियों, डाकुओं, बदमाशों, शराबखोरों और अपराधियों के परिप्रेक्ष्य में भी आसानी से समझा जा सकता है। यदि ये दुष्टता करते हैं, तो प्रतिरोध न कर केवल श्रद्धांजलि सभाएं करते हैं, तब कायरता है। इन्हें बारबार समझाया और सबूत दिया जाता है। विभिन्न मंचों पर नम्रतापूर्वक बताया जाता है। तब भी ये नहीं मानते, तो इन्हें जहन्नुम की राह दिखाना, जेलों में बंद करना या सजा दिलवाना, वीरता है।
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विशेष टीपःः वीरेंद्र देवांगन की ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए goole crome से जाकर amazon.com/virendra Dewangan में देखा जा सकता है।

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