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अवचेतन मन ::-वीरेंद्र देवांगना

अवचेतन मन ::
अवचेतन मन एक विशाल बैंक की मानिंद है, जिसमें उम्रभर की अनुभूति, भावना, मिसाल, विचार और सोच बतौर जानकारी संग्रहित होता रहता है। हम इसी बैंक से वक्त जरूरत सामग्री, विचार, ज्ञान लेकर जीवन संचालित करते रहते हैं।
इसीलिए, हम इसे स्व-मस्तिष्क भी कहते हैं। इसे स्व-मस्तिष्क इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह न केवल निज धारणा व स्व-व्यवहार का कर्ता-धर्ता है, अपितु पूर्वाग्रहों का हिसाबकर्ता व इंसानी आदेश का पालनकर्ता भी है।
साथ ही, यह पाचन-तंत्र, नाड़ी-तंत्र, स्नायु-तंत्र, श्वसन-तंत्र, ह्दय-तंत्र व स्मृति-तंत्र के नियंत्रणकर्ता के रूप में तन का संचालनकर्ता भी है। यह इतना ताकतवर है कि पलभर में लाखों-करोड़ों कोशिकाओं में न सिर्फ संतुलन साध सकता है, अपितु उनको अपने आदेशों के पालनार्थ बाध्य भी कर सकता है।
अफसोस यह कि यह केवल स्वीकार्यता का कार्य करता है। इसमें किसी बात, विचार, भाव, सोच, मुद्दा को अस्वीकार करने का माद्दा नही होता। यह ज्ञान, जानकारी और आंकड़ों का संग्राहक तो है, पर अभिव्यक्ति के लिए वह चेतन मन का सहारा लेता है। इसमें जितना चाहे उतना और जो चाहे वह; डाला व संग्रहित तो किया जा सकता है, पर इसमें से जरूरत की चीजें निकालने के लिए उसे चेतन मन के आश्रित रहना पड़ता है।
इसमें अच्छा डालेंगे, तो अच्छा निकलेगा और खराब डालेंगे, तो खराब निकलेगा। ‘गारबेज इन, गारबेज आउट’। इनपुट अच्छा रहेगा, तो आउटपुट बेहतर निकलेगा। इसलिए इसमें सफलता, सकारात्मकता, धनात्मकता, आशावादिता, निडरता, निःशंकता, श्रमशीलता, व्यवहार-कुशलता और उद्यमशीलता के बीज बोना चाहिए, तो यही फलेगा-फूलेगा और जीवन को सुवासित करेगा।
इसके विपरीत इसमें निष्फलता, नकारात्मकता, ऋणात्मकता, निराशावादिता, संशयता, श्रमहीनता और निरुद्यमशीलता के बीज बोएंगे, तो ऐसा ही फल पाएंगे और बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से होय, कहावत को चरितार्थ करेंगे।
अवचेतन मन, ऐसा पक्षपातरहित उपवन है, जिसको सरोकार नहीं कि उसमें क्या लगाया, बोया या रोपा जा रहा है? उसको तो बस इतना ही मतलब है कि उसमें जो भी लगाया, बोया या रोपा जा रहा है, वह उस उपवन का हिस्सा भर है। यह व्यक्ति पर निर्भर है कि वह उसमे जो बोए, उसके काम के लायक हो।
वस्तुतः इस बगीचे को सदैव सुंदर व सकारात्मक विचाररूपी फूल-पौधों से सजाकर रखना चाहिए और नकारात्मक खरपरवारों व जंगली धांस-फूसों का सफाया करते रहना चाहिए। इस बगीचे में सतर्कता और सजगता दिखाकर आशावादिता के फूल खिलाते रहना चाहिए। हमें अपने अवचेतन मन की ताकत से नफा उठाने की जरूरत को समझने की दरकार है।
जब हम खेत की जुताई कर बीज बोते हैं, तब उसमें केवल बीज अंकुरित नहीं होते। बीजों के अंकुरण के साथ-साथ तमाम किस्म के धास-पांत उग आते हैं। उसे निदाई-गुड़ाई करके निकालना ही होता है, ताकि अंकुरित बीजों की बढ़ोतरी व बेहतरी प्रभावित न हो। यहां हमें विचारों पर भी यही नीति लागू करने की दरकार होती है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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